श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 549, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 549
अध्याय १०३] भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा ५४७
| श्रौतस्मार्तप्रवृत्त्यर्थमुद्वाहार्थमिहागतः ।<br>अतोऽसौ जगतां धात्री धाता तव ममापि च ॥ ४१<br><br>अस्य देवस्य रुद्रस्य मूर्तिभिर्विहितं जगत्।<br>क्ष्माबग्निखेन्दुसूर्यात्मपवनात्मा यतो भवः ॥ ४२<br><br>तथापि तस्मै दातव्या वचनाच्च गिरेर्मम।<br>एषा ह्यजा शुक्लकृष्णा लोहिता प्रकृतिर्भवान् ॥ ४३<br><br>श्रेयोऽपि शैलराजेन सम्बन्धोऽयं तवापि च।<br>तव पाद्मे समुद्भूतः कल्पे नाभ्यम्बुजादहम् ॥ ४४<br><br>मदंशस्यास्य शैलस्य ममापि च गुरुर्भवान्। | किये गये हैं। इन पार्वतीने परमेष्ठी [शिव]-की मायासे हिमवान्की पुत्रीके रूपमें जन्म लिया है। अतः ये सभी लोकोंकी, आपकी तथा मेरी भी धात्री (जननी) हैं और श्रौत-स्मार्त प्रवृत्तिके लिये विवाहके उद्देश्यसे यहाँ आये हुए ये रुद्र सबके धाता (जनक) हैं। चूँकि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, चन्द्र, सूर्य, आत्मा तथा पवन शिवके ही विग्रहस्वरूप हैं, अतः इन रुद्रदेवकी [इन्हीं] मूर्तियोंसे ही जगत् उत्पन्न हुआ है। तथापि हिमवान्के तथा मेरे वचनसे शुक्ल-कृष्ण-लोहित वर्णवाली मायारूपा इन पार्वतीको उन शिवके निमित्त प्रदान कर देना चाहिये; [हे विष्णो!] आप भी प्रकृतिरूप हैं। पर्वतराजके साथ यह सम्बन्ध आपके लिये भी कल्याणप्रद है। मैं पद्मकल्पमें आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुआ था; अतः आप मेरे अंशस्वरूप इन हिमालयके तथा मेरे भी गुरु हैं'॥ ३७-४४ १/२ ॥ |
| <div align="center">सूत उवाच</div>बाढमित्यजमाहासौ देवदेवो जनार्दनः ॥ ४५<br><br>देवाश्च मुनयः सर्वे देवदेवश्च शङ्करः।<br>ततश्चोत्थाय विद्वान् सः पद्मनाभः प्रणम्य ताम् ॥ ४६<br><br>पादौ प्रक्षाल्य देवस्य कराभ्यां कमलेक्षणः।<br>अभ्युक्षदात्मनो मूर्ध्नि ब्रह्मणश्च गिरेस्तथा ॥ ४७<br><br>त्वदीयेषा विवाहार्थं मेनजा ह्यनुजा मम।<br>इत्युक्त्वा सोदकं दत्त्वा देवीं देवेश्वराय ताम् ॥ ४८<br><br>स्वात्मानमपि देवाय सोदकं प्रददौ हरिः। | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तब उन देवदेव जनार्दनने ब्रह्मासे कहा—'ठीक है।' तब देवतागण, सभी मुनि तथा देवदेव शिव प्रसन्न हो गये। तदनन्तर कमलके समान नेत्रवाले उन विद्वान् पद्मनाभ विष्णुने उठकर उन [पार्वती]-को प्रणाम करके अपने हाथोंसे शिवके दोनों चरणोंको धोकर अपने, ब्रह्माके तथा हिमालयके सिरपर जल छिड़का। '[हे शिव!] आपकी नित्यसम्बन्धिनी ये [पार्वती] विवाहविधिकी सिद्धिके लिये ही मेनासे उत्पन्न हुई हैं; ये मेरी छोटी बहन हैं'—ऐसा कहकर विष्णुने उन पार्वतीको देवेश्वरके लिये जलसहित समर्पित करके स्वयं अपनेको भी उन देवके लिये जलसहित समर्पित कर दिया॥ ४५-४८ १/२ ॥ |
| अथ सर्वे मुनिश्रेष्ठाः सर्ववेदार्थपारगाः ॥ ४९<br><br>ऊचुर्दाता गृहीता च फलं द्रव्यं विचारतः।<br>एष देवो हरो नूनं मायया हि ततो जगत् ॥ ५० | इसके बाद सभी वेदोंके अर्थोंमें पारंगत श्रेष्ठ मुनियोंने कहा—'विचार करनेपर वस्तुतः ये महादेव शिव ही दाता, गृहीता, द्रव्य तथा फल सब कुछ हैं और इन्हींकी मायासे यह जगत् स्थित है'—ऐसा कहकर प्रसन्नतासे रोमांचित उन सभीने शिवजीको प्रणाम किया॥ ४९-५० १/२ ॥ |
| इत्युक्त्वा तं प्रणेमुश्च प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः ॥ ५१<br><br>देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः।<br>वेदाश्च मूर्तिमन्तस्ते प्रणेमुस्तं महेश्वरम् ॥ ५२ | उस समय आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने पुष्पवृष्टि की, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और |
1985 Lingamahapuran_Section_19_2_Front