श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भूतकोटिसहस्रेण प्रमथः कोटिभिस्त्रिभिः।<br>वीरभद्रश्चतुःषष्ट्या रोमजाश्चैव कोटिभिः ॥ २५<br>करणश्चैव विंशत्या नवत्या केवलः शुभः।<br>पञ्चाक्षः शतमम्युश्च मेघमन्युस्तथैव च ॥ २६<br>काष्ठकूटश्चतुःषष्ट्या सुकेशो वृषभस्तथा।<br>विरूपाक्षश्च भगवान् चतुःषष्ट्या सनातनः ॥ २७<br>तालकेतुः षडास्यश्च पञ्चास्यश्च सनातनः।<br>संवर्तकस्तथा चैत्रो लकुलीशः स्वयं प्रभुः ॥ २८<br>लोकान्तकश्च दीप्तास्यो तथा दैत्यान्तकः प्रभुः।<br>मृत्युहृत्कालहा कालो मृत्युञ्जयकरस्तथा ॥ २९<br>विषादो विषदश्चैव विद्युतः कान्तकः प्रभुः।<br>देवो भृङ्गी रिटिः श्रीमान् देवदेवप्रियस्तथा ॥ ३०<br>अशनिर्भासकश्चैव चतुःषष्ट्या सहस्रपात्।<br>एते चान्ये च गणपा असंख्यता महाबलाः ॥ ३१<br>सर्वे सहस्त्रहस्ताश्च जटामुकुटधारिणः।<br>चन्द्ररेखावतंसाश्च नीलकण्ठास्त्रिलोचनाः ॥ ३२<br>हारकुण्डलकेयूरमुकुटाद्यैरलङ्कृताः ।<br>ब्रह्मेन्द्रविष्णुसङ्काशा अणिमादिगुणैर्वृताः ॥ ३३<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशास्तत्राजग्मुर्गणेश्वराः ।<br>पातालचारिणश्चैव सर्वलोकनिवासिनः ॥ ३४<br>तुम्बुरुर्नारदो हाहा हूहूश्चैव तु सामगाः।<br>रत्नान्यादाय वाद्यांश्च तत्राजग्मुस्तदा पुरम् ॥ ३५ | प्रमथ [अपने] हजार करोड़ भूतों तथा तीन करोड़ गणोंके साथ आये। वीरभद्र चौंसठ करोड़ गणोंके साथ और रोमज करोड़ों गणोंके साथ आये। करण बीस करोड़ गणोंके साथ और केवल, शुभ, पंचाक्ष, शतमम्यु तथा मेघमन्यु भी नब्बे करोड़ गणोंके साथ आये। काष्ठकूट, सुकेश तथा वृषभ चौंसठ करोड़ गणोंके साथ और भगवान् सनातन विरूपाक्ष भी चौंसठ करोड़ गणोंके साथ आये। इसी प्रकार तालकेतु, षडास्य, पंचास्य, सनातन, संवर्तक, चैत्र, साक्षात् प्रभु लकुलीश, लोकान्तक, दीप्तास्य, प्रभु दैत्यान्तक, मृत्युहृत्, कालहा, काल, मृत्युंजयकर, विषाद, विषद, विद्युत, प्रभु कान्तक, देव, भृंगी, रिटि, श्रीमान् देवदेवप्रिय, अशनि, भासक तथा सहस्रपात् चौंसठ करोड़ गणोंके साथ आये। ये सब तथा अन्य असंख्य महाबली गणेश्वर भी वहाँ आये। वे सभी हजार हाथोंवाले, जटा-मुकुट धारण किये हुए, मस्तकपर चन्द्ररेखासे विभूषित, नीलकण्ठवाले, तीन नेत्रोंवाले, हार-कुण्डल-केयूर-मुकुट आदिसे अलंकृत, ब्रह्मा-इन्द्र-विष्णुके समान प्रतीत होनेवाले, अणिमा आदि सिद्धियोंसे युक्त थे; करोड़ों सूर्योंके सदृश आभावाले पाताललोकमें विचरण करनेवाले तथा सभी लोकोंमें निवास करनेवाले वे गणेश्वर वहाँ आये। तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू एवं साम गान करनेवाले भी रत्नों तथा वाद्ययन्त्रोंको लेकर उस पुरमें आये॥ २५-३५॥ |
| ऋषयः कृत्स्नशस्तत्र देवगीतास्तपोधनाः।<br>पुण्यान् वैवाहिकान् मन्त्रानजपुर्हृष्टमानसाः ॥ ३६ | देवताओंद्वारा स्तुत तथा तपोधन बहुत-से ऋषिगण प्रसन्नचित्त होकर विवाहसम्बन्धी पवित्र मन्त्रोंका उच्चारण करने लगे ॥ ३६ ॥ |
| तत एवं प्रवृत्ते तु सर्वतश्च समागमे।<br>गिरिजां तामलङ्कृत्य स्वयमेव शुचिस्मिताम् ॥ ३७<br>पुरं प्रवेशयामास स्वयमादाय केशवः।<br>सदस्याह च देवेशं नारायणमजो हरिम् ॥ ३८ | इस प्रकार पूर्णरूपसे सबके उपस्थित हो जानेपर विष्णुने स्वयं पवित्र मुसकानवाली पार्वतीको अलंकृत करके तथा स्वयं उन्हें ला करके पुरमें प्रवेश कराया। तदनन्तर ब्रह्माने देवताओंके स्वामी नारायण विष्णुसे सभामें कहा— |
| भवानग्रे समुत्पन्नो भवान्या सह दैवतैः।<br>वामाङ्गादस्य रुद्रस्य दक्षिणाङ्गादहं प्रभो ॥ ३९<br>मन्मूर्तिस्तुहिनाद्रीशो यज्ञार्थं सृष्ट एव हि।<br>एषा हैमवती जज्ञे मायया परमेष्ठिनः ॥ ४० | ‘हे प्रभो! पहले आप इन रुद्रके बाएँ अंगसे भवानी तथा देवताओंके साथ उत्पन्न हुए और मैं इनके दाहिने अंगसे उत्पन्न हुआ। मेरे अंशस्वरूप पर्वतराज हिमालय वास्तवमें इस यज्ञके लिये ही उत्पन्न |