भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १०२] पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ५४१

स बाहुरुद्यमस्तस्य तथैव समुपस्थितः।<br>स्तम्भितः शिशुरूपेण देवदेवेन लीलया ॥ ३१<br><br>वज्रं क्षेप्तुं न शशाक बाहुं चालयितुं तथा।<br>वह्निः शक्तिं तथा क्षेप्तुं न शशाक तथा स्थितः ॥ ३२क्षुब्ध हो उठे॥ २८-२९ १/२ ॥<br><br>वृत्रासुरका संहार करनेवाले इन्द्रने भुजा उठाकर उस [शिशु]-के ऊपर वज्र चलाना चाहा, किंतु उनका उठा हुआ वह बाहु वैसा ही रह गया। शिशुरूपधारी देवदेव [शिव]-के द्वारा लीलापूर्वक स्तम्भित कर दिये गये वे इन्द्र वज्र फेंकने तथा अपनी भुजा चलानेमें समर्थ नहीं हुए। [इसी प्रकार] अग्निदेव भी अपनी शक्ति चलानेमें समर्थ नहीं हुए और वैसे ही खड़े रह गये॥ ३०-३२॥
यमोऽपि दण्डं खड्गं च निर्ऋतिर्मुनिपुङ्गवाः।<br>वरुणो नागपाशं च ध्वजयष्टिं समीरणः ॥ ३३<br><br>सोमो गदां धनेशश्च दण्डं दण्डभृतां वरः।<br>ईशानश्च तथा शूलं तीव्रमुद्यम्य संस्थितः ॥ ३४<br><br>रुद्राश्च शूलमादित्या मुशलं वसवस्तथा।<br>मुद्गरं स्तम्भिताः सर्वे देवेनाशु दिवौकसः ॥ ३५<br><br>स्तम्भिता देवदेवेन तथान्ये च दिवौकसः।हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी प्रकार यम अपने दण्डको, निर्ऋति अपने खड्गको, वरुण अपने नागपाशको, वायुदेव अपने ध्वजदण्डको, सोम अपनी गदाको, दण्डधारियोंमें श्रेष्ठ कुबेर अपने दण्डको तथा ईशान अपने तीक्ष्ण त्रिशूलको उठाकर खड़े ही रह गये। सभी रुद्र शूलको, सभी आदित्य मुसलको तथा वसुगण मुद्गरको उठाये ही रह गये; सभी देवता शीघ्र ही महादेवके द्वारा स्तम्भित कर दिये गये। [इसी प्रकार] देवाधिदेवने अन्य देवताओंको भी स्तम्भित कर दिया॥ ३३-३५ १/२॥
शिरः प्रकम्पयन् विष्णुश्चक्रमुद्यम्य संस्थितः ॥ ३६<br><br>तस्यापि शिरसो बालः स्थिरत्वं प्रचकार ह।<br>चक्रं क्षेप्तुं न शशाक बाहूंचालयितुं न च ॥ ३७<br><br>पूषा दन्तान् दशन् दन्तैर्बालमैक्षत मोहितः।<br>तस्यापि दशनाः पेतुर्दृष्टमात्रस्य शम्भुना ॥ ३८विष्णु [अपने] सिरको हिलाते हुए चक्र उठाकर खड़े रहे। उस बालकने उनके भी सिरको स्थिर कर दिया। वे [विष्णु] अपना चक्र फेंकने तथा बाहुओंको चलानेमें समर्थ नहीं हुए। पूषाने मोहित होकर अपने दाँतोंसे दाँतोंको किटकिटाते हुए उस बालककी ओर देखा। शिवके देखनेमात्रसे ही उसके दाँत गिर गये।
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