श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक (मूल संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
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| बलं तेजश्च योगं च तथैवास्तम्भयद्विभुः।<br>अथ तेषु स्थितेष्वेव मन्युमत्सु सुरेष्वपि ॥ ३९ | उसी प्रकार विभु शिवने सबके बल, तेज तथा योगको स्तम्भित कर दिया॥ ३६–३८ १/२॥ |
| ब्रह्मापरमसंविग्नो ध्यानमास्थाय शङ्करम्।<br>बुबुधे देवमीशानमुमोत्सङ्गे तमास्थितम्॥ ४०<br>स बुद्ध्वा देवमीशानं शीघ्रमुत्थाय विस्मितः।<br>ववन्दे चरणौ शम्भोरस्तुवच्च पितामहः॥ ४१<br>पुराणैः सामसङ्गीतैः पुण्याख्यैर्गुह्यनामभिः। | इसके बाद क्रोधमें भरे हुए उन समस्त देवताओंके स्तम्भित हो जानेपर अत्यन्त व्याकुल ब्रह्माने शंकरका ध्यान करके यह जान लिया कि उमाकी गोदमें वे भगवान् ईशान ही विराजमान हैं। ईशानदेवको पहचानकर शीघ्र उन्हें उठाकर विस्मित हुए पितामहने शम्भुके चरणोंकी वन्दना की और प्राचीन सामगानों, उनके पवित्र नामों तथा गुप्त नामोंके द्वारा उनकी स्तुति की॥ ३९–४१ १/२॥ |
| स्रष्टा त्वं सर्वलोकानां प्रकृतेश्च प्रवर्तकः॥ ४२<br>बुद्धिस्त्वं सर्वलोकानामहङ्कारस्त्वमीश्वरः।<br>भूतानामिन्द्रियाणां च त्वमेवेश प्रवर्तकः॥ ४३<br>तवाहं दक्षिणादङ्गात्सृष्टः पूर्वं पुरातनः।<br>वामहस्तान्महाबाहो देवो नारायणः प्रभुः॥ ४४<br>इयं च प्रकृतिर्देवी सदा ते सृष्टिकारण।<br>पत्नीरूपं समास्थाय जगत्कारणमागता॥ ४५<br>नमस्तुभ्यं महादेव महादेव्यै नमो नमः।<br>प्रसादात्तव देवेश नियोगाच्च मया प्रजाः॥ ४६<br>देवाद्यास्तु इमाः सृष्टा मूढास्त्वद्योगमोहिताः।<br>कुरु प्रसादमैतेषां यथापूर्वं भवन्त्विमे॥ ४७ | [ब्रह्माने कहा—] आप समस्त लोकोंके स्रष्टा तथा प्रकृतिके प्रवर्तक हैं। आप सभी लोकोंकी बुद्धि एवं अहंकार हैं। आप ईश्वर हैं। हे ईश! आप ही सभी प्राणियोंकी इन्द्रियोंके प्रवर्तक हैं। हे महाबाहो! सर्वप्रथम आपके दाहिने हाथसे पुरातन मैं [ब्रह्मा] उत्पन्न हुआ हूँ और बायें हाथसे भगवान् प्रभु नारायण उत्पन्न हुए हैं। हे सृष्टिकारण! ये देवी प्रकृति सर्वदा आपकी पत्नीका रूप धारणकर जगत्की कारणभूता बनी हैं। हे महादेव! आपको नमस्कार है; महादेवीको बार-बार नमस्कार है। हे देवेश! मैंने आपकी कृपासे तथा आपके आदेशसे इन प्रजाओं तथा देवता आदिका सृजन किया है। आपके योगसे मोहित होकर ये देवगण अब मूढ़ताको प्राप्त हो गये हैं। अब आप इनपर अनुग्रह कीजिये, जिससे ये पूर्वकी भाँति हो जायँ॥ ४२–४७॥ |
| सूत उवाच<br>विज्ञाप्यैवं तदा ब्रह्मा देवदेवं महेश्वरम्।<br>संस्तम्भितांस्तदा तेन भगवानाह पद्मजः॥ ४८<br>मूढास्थ देवताः सर्वा नैव बुध्यत शङ्करम्।<br>देवदेवमिहायान्तं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ४९<br>गच्छध्वं शरणं शीघ्रं देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>सनारायणकाः सर्वे मुनिभिः शङ्करं प्रभुम्॥ ५०<br>सार्धं मयैव देवेशं परमात्मानमीश्वरम्।<br>अनया हैमवत्या च प्रकृत्या सह सत्तमम्॥ ५१ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इस प्रकार देवदेव महेश्वरका स्तवन करके पद्मयोनि भगवान् ब्रह्माने उन [शिव]-के द्वारा स्तम्भित किये गये देवताओंसे कहा— मूढ़ताको प्राप्त आप सभी देवताओंने सभी देवोंसे नमस्कृत होनेवाले यहाँ आये हुए देवदेव शंकरको नहीं पहचाना। हे देवताओ! इन्द्र आदि आप सभी देवगण नारायणको, सभी मुनियोंको तथा मुझको साथ लेकर इन प्रकृतिस्वरूपा पार्वतीके साथ विराजमान सर्वश्रेष्ठ, प्रभु, देवेश, परमात्मा, ईश्वर शंकरकी शरणमें शीघ्र चलिये॥ ४८–५१॥ |
| तत्र ते स्तम्भितास्तेन तथैव सुरसत्तमाः।<br>प्रणेमुर्मनसा सर्वे सनारायणकाः प्रभुम्॥ ५२ | तब उन शिवके द्वारा वहाँपर स्तम्भित किये गये नारायणसहित उन सभी श्रेष्ठ देवताओंने प्रभु [शिव]-को मनसे प्रणाम किया॥ ५२॥ |
| अथ तेषां प्रसन्नोऽभूद्देवदेवस्त्रियम्बकः।<br>यथापूर्वं चकाराशु वचनाद् ब्रह्मणः प्रभुः॥ ५३ | इसके बाद देवदेव त्रिलोचन [शिव] उनपर |