भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 542
५४०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आलिङ्ग्याघ्राय सम्पूज्य पुत्रीं साक्षात्तपस्विनीम्।<br>दुहितुर्देवदेवेन न जानन्नभिमन्त्रितम्॥ १६<br>स्वयंवरं तदा देव्याः सर्वलोकेष्वघोषयत्।<br>अथ ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः साक्षाज्जनार्दनः॥ १७और इसके बाद वे भी चली गयीं। तब देवीको देखकर मैनासहित हिमालय साक्षात् तपस्विनी अपनी पुत्रीका आलिंगन करके, उनका मस्तक सूंघकर और उनकी पूजा करके अत्यन्त प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् देवाधिदेव [शिव]-द्वारा अपनी पुत्रीको दिये गये संकेतको न जानते हुए भी हिमालयने सभी लोकोंमें देवीके स्वयंवरकी घोषणा कर दी॥ १४-१६१/२॥
शक्रश्च भगवान् वह्निर्भास्करो भग एव च।<br>त्वष्टार्यमा विवस्वांश्च यमो वरुण एव च॥ १८<br>वायुः सोमस्तथेशानो रुद्राश्च मुनयस्तथा।<br>अश्विनौ द्वादशादित्या गन्धर्वा गरुडस्तथा॥ १९<br>यक्षाः सिद्धास्तथा साध्या दैत्याः किंपुरुषोरगाः।<br>समुद्राश्च नदा वेदा मन्त्राः स्तोत्रादयः क्षणाः॥ २०<br>नागाश्च पर्वताः सर्वे यज्ञाः सूर्यादयो ग्रहाः।<br>त्रयस्त्रिंशच्च देवानां त्रयश्च त्रिशतं तथा॥ २१<br>त्रयश्च त्रिसहस्रं च तथान्ये बहवः सुराः।<br>जग्मुर्गिरीन्द्रपुत्र्यास्तु स्वयंवरमनुत्तमम्॥ २२इसके अनन्तर ब्रह्मा, साक्षात् भगवान् जनार्दन विष्णु, ऐश्वर्यशाली इन्द्र, अग्निदेव, सूर्य, भग, त्वष्टा, अर्यमा, विवस्वान्, यम, वरुण, वायु, सोम, ईशान, सभी रुद्र, मुनिगण, दोनों अश्विनीकुमार, बारहों आदित्य, समस्त गन्धर्व, गरुड़, यक्ष, सिद्ध, साध्य, दैत्य, किंपुरुष, उरग, समुद्र, नद, वेद, मन्त्र, स्तोत्र आदि, क्षण, नाग, पर्वत, सभी यज्ञ, सूर्य आदि ग्रह, वसु, रुद्र तथा आदित्य आदि तैंतीस देवताओंके भेद-प्रभेदरूप ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ये तीन, तीन सौ तथा तीन हजार तीन देवता तथा अन्य बहुत-से देवता पर्वतराजकी पुत्रीके अत्युत्तम स्वयंवरमें पहुँचे॥ १७-२२॥
अथ शैलसुता देवी हैममारुह्य शोभनम्।<br>विमानं सर्वतोभद्रं सर्वरत्नैरलङ्कृतम्॥ २३<br>अप्सरोभिः प्रनृत्ताभिः सर्वाभरणभूषितैः।<br>गन्धर्वैःसिद्धैर्विविधैः किन्नरैश्च सुशोभनैः॥ २४<br>वन्दिभिः स्तूयमाना च स्थिता शैलसुता तदा।<br>सितातपत्रं रत्नांशुमिश्रितं चावहत्तथा॥ २५<br>मालिनी गिरिपुत्र्यास्तु सन्ध्यापूर्णेन्दुमण्डलम्।<br>चामरासक्तहस्ताभिर्दिव्यस्त्रीभिश्च संवृता॥ २६<br>मालां गृह्य जया तस्थौ सुरद्रुमसमुद्भवाम्।<br>विजया व्यजनं गृह्य स्थिता देव्याः समीपगा॥ २७तदनन्तर पार्वती देवी स्वर्णनिर्मित तथा सभी रत्नोंसे अलंकृत सर्वतोभद्र नामक उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर नृत्य करती हुई अप्सराओं, सभी आभूषणोंसे विभूषित विविध गन्धर्वों, सिद्धों तथा परम सुन्दर किन्नरोंके साथ और बन्दीजनोंद्वारा स्तुत होती हुई वहाँ उपस्थित हुईं। [उनकी सखी] मालिनी रत्नकिरणोंसे मिश्रित श्वेत वर्णका सन्ध्याकालीन चन्द्रमण्डलसदृश छत्र [उन] पार्वतीके ऊपर लगाये हुए थी। वे पार्वती हाथोंमें चँवर लिये हुई दिव्य स्त्रियोंसे घिरी हुई थीं। कल्पवृक्षके पुष्पोंसे निर्मित माला [हाथमें] लेकर जया [नामक सखी] खड़ी थी और विजया व्यजन (पंखा) लेकर देवीके समीप खड़ी थी॥ २३-२७॥
मालां प्रगृह्य देव्यां तु स्थितायां देवसंसदि।<br>शिशुर्भूत्वा महादेवः क्रीडार्थं वृषभध्वजः॥ २८<br>उत्सङ्गतलसंसुप्तो बभूव भगवान् भवः।<br>अथ दृष्ट्वा शिशुं देवास्तस्या उत्सङ्गवर्तिनम्॥ २९<br>कोऽयमत्रेति सम्मन्त्र्य चुक्षुभुश्च समागताः।<br>वज्रमाहारयत्तस्य बाहुमुद्यम्य वृत्रहा॥ ३०देवताओंकी सभामें [अपने हाथमें] माला लेकर देवी पार्वतीके स्थित होनेपर भगवान् वृषभध्वज भव महादेव क्रीड़ा करनेके लिये एक शिशुके रूपमें होकर देवीकी गोदमें सोये हुएकी भाँति स्थित हो गये। तब उनकी गोदमें स्थित शिशुको देखकर 'यहाँपर यह कौन है'—ऐसा विचार करके [वहाँ] उपस्थित देवतागण