श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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सौवाँ अध्याय
वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह
| ऋषय ऊचुः<br>विजित्य विष्णुना सार्धं भगवान् परमेश्वरः।<br>सर्वान् दधीचवचनात्कथं भेजे महेश्वरः॥ १ | ऋषिगण बोले— [ हे सूतजी!] परमेश्वर भगवान् महेश्वरने दधीचके कहनेसे विष्णुसहित सबको जीतकर पुनः यज्ञका सेवन कैसे किया ? ॥ १ ॥ |
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| सूत उवाच<br>दक्षयज्ञे सुविपुले देवान् विष्णुपुरोगमान्।<br>ददाह भगवान् रुद्रः सर्वान् मुनिगणानपि॥ २<br><br>भद्रो नाम गणस्तेन प्रेषितः परमेष्ठिना।<br>विप्रयोगेन देव्या वै दुःसहेनैव सुव्रताः॥ ३<br><br>सोऽसृजद्वीरभद्रश्च गणेशान् रोमजाञ्छुभान्।<br>गणेश्वरैः समारुह्य रथं भद्रः प्रतापवान्॥ ४<br><br>गन्तुं चक्रे मतिं यस्य सारथिर्भगवानजः।<br>गणेश्वराश्च ते सर्वे विविधायुधपाणयः॥ ५<br><br>विमानैर्विश्वतो भद्रैस्तमन्वयुरथो सुराः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये हेमशृङ्गे सुशोभने॥ ६<br><br>यज्ञवाटस्तथा तस्य गङ्गाद्वारसमीपतः।<br>तद्देशे चैव विख्यातं शुभं कनखलं द्विजाः॥ ७ | सूतजी बोले— [ हे ऋषियो!] भगवान् रुद्रने दक्षके अति महान् यज्ञमें विष्णु आदि प्रमुख देवताओं तथा सभी मुनियोंको जला दिया। हे सुव्रतो! देवीके असहनीय वियोगके कारण उन शिवजीने [अपने] भद्र नामक गणको भेजा। उस वीरभद्रने अपने रोमोंसे उत्तम गणेश्वरोंको उत्पन्न किया। तब गणेश्वरोंके साथ रथपर सवार होकर प्रतापशाली वीरभद्रने प्रस्थान करनेका निश्चय किया; जिनके सारथि भगवान् ब्रह्मा थे। हाथोंमें विविध आयुध लिये हुए वे सभी गणेश्वर तथा देवता शुभ विमानोंपर आरूढ़ होकर सभी ओरसे उन वीरभद्रके पीछे-पीछे चले। हे द्विजो! हिमवान्के रमणीय तथा परम सुन्दर सुवर्णमय शिखरपर गंगाद्वारके समीप कनखल नामक शुभ तथा विख्यात स्थान है; उसी स्थानमें उन दक्षकी यज्ञशाला थी ॥ २–७ ॥<br><br>जब शिवजीने भगवान् वीरभद्रको [यज्ञको] दग्ध<br><br>(चित्र)<br><br>करनेके लिये भेजा, उस समय लोकोंको भयभीत |
| दग्धुं वै प्रेषितश्चासौ भगवान् परमेष्ठिना।<br>तदोत्पातो बभूवाथ लोकानां भयशंसनः॥ ८ |