श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ९९ ] | भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव | ५२९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| लिङ्गस्तु भगवान् द्वाभ्यां जगत्सृष्टिर्द्विजोत्तमाः।<br>लिङ्गमूर्तिः शिवो ज्योतिस्तमसश्चोपरि स्थितः॥ ७<br>लिङ्गवेदिसमायोगादर्धनारीश्वरोऽभवत् ।<br>ब्रह्माणं विदधे देवमग्रे पुत्रं चतुर्मुखम्॥ ८ | त्रिगुणवेदिका प्रकृतिरूपा हैं। लिङ्गरूप शिव सदा भगयुक्त रहते हैं। हे उत्तम द्विजो! इन्हीं दोनों [लिङ्ग तथा भग]-से ही जगत्की सृष्टि होती है। लिङ्गस्वरूप शिव प्रकाशरूप हैं और सदा मायारूपी तम (अन्धकार)-के ऊपर विराजमान हैं। लिङ्ग तथा वेदीके समायोगसे शिव अर्धनारीश्वर हो गये। उन्होंने पहले चतुर्मुख देव ब्रह्माको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ६–८॥ |
| प्राहिणोति स्म तस्यैव ज्ञानं ज्ञानमयो हरः।<br>विश्वाधिकोऽसौ भगवानर्धनारीश्वरो विभुः॥ ९<br>हिरण्यगर्भं तं देवो जायमानमपश्यत।<br>सोऽपि रुद्रं महादेवं ब्रह्मापश्यत शङ्करम्॥ १०<br>तं दृष्ट्वा संस्थितं देवमर्धनारीश्वरं प्रभुम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्वरदं वारिजोद्भवः॥ ११<br>विभजस्वेति विश्वेशं विश्वात्मानमजो विभुः।<br>ससर्ज देवीं वामाङ्गात्पत्नीं चैवात्मनः समाम्॥ १२ | ज्ञानमय तथा विश्वमें सबसे बढ़कर विभु अर्धनारीश्वर भगवान् हरने उन [ब्रह्मा]-को ज्ञान प्रदान किया। शिवजीने उत्पन्न हुए ब्रह्माको देखा और उन ब्रह्माने भी रुद्र शंकर महादेवको देखा। वहाँ स्थित अर्धनारीश्वर प्रभु शिवको देखकर ब्रह्माने अभीष्ट वचनोंसे उन वरदाता [शिव]-की स्तुति की। इसके बाद प्रभु अजने विश्वेश्वर विश्वात्मा [शिव]-से प्रार्थना की—'अपनेको विभक्त कीजिये।' तब उन्होंने अपने बायें अंगसे पत्नीके रूपमें अपने ही समान देवीका सृजन किया॥ ९–१२॥ |
| श्रद्धा ह्यस्य शुभा पत्नी ततः पुंसः पुरातनी।<br>सैवाज्ञया विभोर्देवी दक्षपुत्री बभूव ह॥ १३<br>सतीसंज्ञा तदा सा वै रुद्रमेवाश्रिता पतिम्।<br>दक्षं विनिन्द्य कालेन देवी मैना ह्यभूत्पुनः॥ १४ | इन [आत्मरूप] पुरुषकी पुरातन शुभा पत्नी श्रद्धा हैं; शिवकी आज्ञासे वे देवी दक्षपुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुईं। उस समय उनका नाम सती पड़ा और उन्होंने रुद्रको पतिके रूपमें स्वीकार किया। कुछ समयके बाद दक्षकी निन्दा करके वे देवी पुनः मेनाकी पुत्री हुईं॥ १३-१४॥ |
| नारदस्यैव दक्षोऽपि शापाद्देवं विनिन्द्य च।<br>अवज्ञादुर्मदो दक्षो देवदेवमुमापतिम्॥ १५<br>अनादृत्य कृतिं ज्ञात्वा सती दक्षेण तत्क्षणात्।<br>भस्मीकृत्यात्मनो देहं योगमार्गेण सा पुनः॥ १६<br>बभूव पार्वती देवी तपसा च गिरेः प्रभोः।<br>ज्ञात्वैतद्भगवान् भर्गो ददाह रुषितः प्रभुः॥ १७<br>दक्षस्य विपुलं यज्ञं च्यावनेर्वचनादपि।<br>च्यवनस्य सुतो धीमान् दधीच इति विश्रुतः॥ १८<br>विजित्य विष्णुं समरे प्रसादात् त्र्यम्बकस्य च।<br>विष्णुना लोकपालांश्च शशाप च मुनीश्वरः॥ १९<br>रुद्रस्य क्रोधजेनैव वह्निना हविषा सुराः।<br>विनाशो वै क्षणादेव मायया शङ्करस्य वै॥ २० | नारदके शापके कारण अवज्ञासे दुर्मद दक्षने भी देवदेव उमापतिकी निन्दा करके यज्ञ किया। तब शिवके प्रति अनादरपूर्ण दक्षकृत्यको जानकर सतीने उसी क्षण अपनी देहको योगमार्गसे भस्म करके पुनः पर्वतराज हिमाचलकी तपस्यासे [उनकी पुत्री होकर] देवी पार्वतीके रूपमें जन्म लिया। यह जानकर च्यवनके पुत्रके कहनेसे भगवान् प्रभु भर्गने कुपित होकर दक्षके विस्तृत यज्ञको जला दिया। च्यवनके बुद्धिमान् पुत्र दधीच नामसे प्रसिद्ध थे। शिवकी कृपासे युद्धमें विष्णुको जीतकर उन मुनीश्वरने विष्णुसहित लोकपालोंको यह शाप दे दिया—'हे देवताओ! शंकरकी मायाके कारण रुद्रके क्रोधसे उत्पन्न हविष्याग्निके द्वारा क्षणभरमें [आपलोगोंका] विनाश हो जायगा'॥ १५–२०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवीसम्भवो नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवीकी उत्पत्ति' नामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९९॥