भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग ---|---

अश्वमेधसहस्रेण फलं भवति तस्य वै।<br>घृताद्यैः स्नापयेद् रुद्रं स्थाल्या वै कलशैः शुभैः ॥ १९१<br>नाम्नां सहस्रेणानेन श्रद्धया शिवमिश्वरम्।<br>सोऽपि यज्ञसहस्रस्य फलं लब्ध्वा सुरेश्वरैः ॥ १९२<br>पूज्यो भवति रुद्रस्य प्रीतिर्भवति तस्य वै।<br>तथास्त्विति तथा प्राह पद्मयोनिर्जनार्दनम् ॥ १९३<br>जग्मतुः प्रणिपत्यैनं देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>तस्मान्नाम्नां सहस्रेण पूजयेदनघो द्विजाः ॥ १९४<br>जपेन्नाम्नां सहस्रं च स याति परमां गतिम् ॥ १९५आदिसे परिपूर्ण स्थाली अथवा शुभ कलशोंसे इस सहस्रनामके द्वारा भगवान् रुद्र शिवको श्रद्धापूर्वक स्नान कराता है, वह भी हजार यज्ञोंका फल प्राप्त करके सुरेश्वरोंके द्वारा पूजित होता है और उसके प्रति रुद्रकी प्रीति होती है॥ १८८-१९२१/२॥<br>तब ब्रह्माने विष्णुसे कहा—'ऐसा ही हो।' इसके बाद इन जगद्गुरु देवदेव [शिव]-को प्रणाम करके वे दोनों (ब्रह्मा-विष्णु) चले गये। अतः हे द्विजो! जो निष्पाप व्यक्ति [इस] हजार नामोंसे शिवकी पूजा करता है और हजार नामोंका जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥ १९३-१९५॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सहस्रनामभिः पूजनाद्विष्णुचक्रलाभो नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सहस्रनामोंद्वारा पूजनसे विष्णुको चक्रलाभ' नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९८ ॥


निन्यानबेवाँ अध्याय

भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव तथा शिवाका दक्षपुत्री सतीके रूपमें पुनः मेनाकी कन्या पार्वतीके रूपमें प्राकट्य

ऋषय ऊचुः<br>सम्भवः सूचितो देव्यास्त्वया सूत महामते।<br>सविस्तरं वदस्वाद्य सतीत्वे च यथातथम् ॥ १<br>मेनाजत्वं महादेव्या दक्षयज्ञविमर्दनम्।<br>विष्णुना च कथं दत्ता देवदेवाय शम्भवे ॥ २<br>कल्याणं वा कथं तस्य वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्।<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः ॥ ३<br>सम्भवं च महादेव्याः प्राह तेषां महात्मनाम्।ऋषिगण बोले—हे सूतजी! हे महामते! आपने देवीकी उत्पत्तिके विषयमें बताया; अब उनके सतीत्वके विषयमें ठीक-ठीक विस्तारपूर्वक बताइये और महादेविका मेनासे उत्पन्न होने तथा दक्षके यज्ञविध्वंसका भी वर्णन कीजिये; विष्णुने देवदेव शम्भुको उन्हें कैसे प्रदान किया और उन विष्णुका कल्याण किस प्रकार हुआ—यह सब इस समय बतानेकी कृपा कीजिये॥ १-२१/२॥<br>उनका यह वचन सुनकर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजी उन महात्माओंसे महादेविके जन्मके विषयमें बताने लगे॥ ३१/२॥
सूत उवाच<br>ब्रह्मणा कथितं पूर्वं दण्डिने तत्सुविस्तरम् ॥ ४<br>युष्माभिर्वै कुमाराय तेन व्यासाय धीमते।<br>तस्मादहमुपश्रुत्य प्रवदामि सुविस्तरम् ॥ ५<br>वचनाद्भो महाभागाः प्रणम्योमां तथा भवम्।<br>सा भगाख्या जगद्धात्री लिङ्गमूर्तेस्त्रिवेदिका ॥ ६सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] आपलोगोंने जो पूछा है, उस विषयमें सर्वप्रथम ब्रह्माने दण्डी सनत्कुमारको विस्तारसे बताया था, पुनः उन सनत्कुमारने बुद्धिमान् व्यासजीको बताया और हे महाभागो! उन [व्यासजी]-से सुन करके मैं आपलोगोंके कहनेपर उमा तथा शिवको प्रणाम करके विस्तारपूर्वक आप लोगोंको बता रहा हूँ॥ ४-५१/२॥<br>वे जगन्माता भग नामवाली और लिङ्गरूप शिवकी