भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ९८ ] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५२७


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उन सुव्रत [विष्णु]-को पद्माक्ष (कमलनयन) कहा जाता है॥ १७६-१७७॥
दत्तवैवं नयनं चक्रं विष्णवे नीललोहितः।<br>पस्पर्श च कराभ्यां वै सुशुभाभ्यामुवाच ह॥ १७८<br><br>वरदोऽहं वरश्रेष्ठ वरान् वरय चेप्सितान्।<br>भक्त्या वशीकृतो नूनं त्वयाहं पुरुषोत्तम॥ १७९विष्णुको चक्र तथा नेत्र प्रदान करके नीललोहित [शिव]-ने अपने परम पवित्र हाथोंसे उनका स्पर्श किया और कहा—'हे वरश्रेष्ठ! मैं वरदाता हूँ, आप अभीष्ट वरोंको माँगिये। हे पुरुषोत्तम! आपने निश्चित रूपसे अपनी भक्तिसे मुझे वशमें कर लिया है'॥ १७८-१७९॥
इत्युक्तो देवदेवेन देवदेवं प्रणम्य तम्।<br>त्वयि भक्तिर्महादेव प्रसीद वरमुत्तमम्॥ १८०<br><br>नान्यमिच्छामि भक्तानामार्तयो नास्ति यत्प्रभो।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दयावान् सुतरां भवः॥ १८१देवाधिदेवके इस प्रकार कहनेपर विष्णुने उन देवदेवेश्वरको प्रणाम करके कहा—'हे महादेव! आपमें मेरी [पूर्ण] भक्ति हो, आप मुझपर प्रसन्न होइये। हे प्रभो! मैं अन्य उत्तम वर नहीं चाहता; क्योंकि भक्तोंकी अन्य कामनाएँ नहीं होती हैं'॥ १८० १/२॥
पस्पर्श च ददौ तस्मै श्रद्धां शीतांशुभूषणः।<br>प्राह चैवं महादेवः परमात्मानमच्युतम्॥ १८२<br><br>मयि भक्तश्च वन्द्यश्च पूज्यश्चैव सुरासुरैः।<br>भविष्यसि न सन्देहो मत्प्रसादात्सुरोत्तम॥ १८३<br><br>यदा सती दक्षपुत्री विनिन्द्यैव सुलोचना।<br>मातरं पितरं दक्षं भविष्यति सुरेश्वरी॥ १८४<br><br>दिव्या हैमवती विष्णो तदा त्वमपि सुव्रत।<br>भगिनीं तव कल्याणीं देवीं हैमवतीमुमाम्॥ १८५<br><br>नियोगाद् ब्रह्मणः साध्वीं प्रदास्यसि ममैव ताम्।<br>मत्सम्बन्धी च लोकानां मध्ये पूज्यो भविष्यसि॥ १८६<br><br>मां दिव्येन च भावेन तदाप्रभृति शङ्करम्।<br>द्रक्ष्यसे च प्रसन्नेन मित्रभूतमिवात्मना॥ १८७उनका वचन सुनकर परम दयालु शिवने उनका स्पर्श किया और उन्हें [अपनी] भक्ति प्रदान की। तत्पश्चात् चन्द्रमाको भूषणके रूपमें धारण करनेवाले महादेवने परमात्मा अच्युत (विष्णु)-से कहा—'हे सुरोत्तम! मेरी कृपासे आप मुझमें भक्ति रखनेवाले और देवताओं तथा असुरोंके वन्दनीय तथा पूजनीय होंगे; इसमें सन्देह नहीं है। हे विष्णो! हे सुव्रत! जब सुन्दर नेत्रोंवाली दक्षपुत्री सती अपनी माता तथा पिता दक्षकी निन्दा करके सुरेश्वरीके रूपमें हिमवान्की दिव्य कन्या होकर उत्पन्न होंगी; उस समय आप ब्रह्माके आदेशसे अपनी भगिनीरूपा उन हिमवान्की पुत्री कल्याणी साध्वी देवी उमाको मुझे प्रदान करेंगे। तब लोकोंके बीच मेरे सम्बन्धीके रूपमें आप पूज्य होंगे। उस समयसे आप दिव्य भावसे तथा प्रसन्न मनसे मुझ शंकरको मित्रकी भाँति देखेंगे'—ऐसा कहकर नीललोहित भगवान् रुद्र अन्तर्धान हो गये॥ १८१-१८७ १/२॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे रुद्रो भगवान्नीललोहितः।<br>जनार्दनोऽपि भगवान् देवानामपि सन्निधौ॥ १८८<br><br>अयाचत महादेवं ब्रह्माणं मुनिभिः समम्।<br>मया प्रोक्तं स्तवं दिव्यं पद्मयोने सुशोभनम्॥ १८९<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्।<br>प्रतिनाम्नि हिरण्यस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात्॥ १९०भगवान् जनार्दनने भी देवताओंकी उपस्थितिमें मुनियोंके साथ महान् देवता ब्रह्मासे प्रार्थना की—हे पद्मयोने! जो मेरे द्वारा कहे गये दिव्य तथा परम सुन्दर स्तव (सहस्रनाम स्तोत्र)-को पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है; वह प्रत्येक नामके उच्चारणपर सुवर्णके दानका फल प्राप्त करता है और उसे हजार अश्वमेध यज्ञ करनेसे होनेवाला फल मिलता है। जो घृत