भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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५२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शूलटङ्कगदाचक्रकुन्तपाशधरं हरम्।<br>वरदाभयहस्तं च द्वीपिचर्मोत्तरीयकम्॥ १६५<br><br>इत्थंभूतं तदा दृष्ट्वा भवं भस्मविभूषितम्।<br>हृष्टो नमश्चकाराशु देवदेवं जनार्दनः॥ १६६जटारूपी मुकुटसे मण्डित, ज्वालासमूहसे घिरे हुए, दिव्य, तीक्ष्ण दाँतोंवाले, भयंकर, शूल-टंक-गदा-चक्र-भाला-पाश धारण किये हुए, वर तथा अभय मुद्रायुक्त हाथवाले, बाघके चर्मको उत्तरीयके रूपमें धारण किये हुए तथा भस्मसे विभूषित—इस प्रकारके रूपवाले हर भवको देखकर प्रसन्न हुए जनार्दनने उन देवदेव [शिव]-को शीघ्र प्रणाम किया॥ १६५-१६६॥
दुद्रुवुस्तं परिक्रम्य सेन्द्रा देवास्त्रिलोचनम्।<br>चचाल ब्रह्मभुवनं चकम्पे च वसुन्धरा॥ १६७<br><br>ददाह तेजस्तच्छम्भोः प्रान्तं वै शतयोजनम्।<br>अधस्ताच्चोर्ध्वतश्चैव हाहेत्यकृत भूतले॥ १६८इन्द्रसहित देवतागण त्रिलोचनकी परिक्रमा करके भागने लगे, ब्रह्मलोक हिल उठा और पृथ्वी काँपने लगी। शिवका वह तेज नीचेसे तथा ऊपरसे सौ योजन स्थानको जलाने लगा; इससे पृथ्वीतलपर हाहाकार मच गया॥ १६७-१६८॥
तदा प्राह महादेवः प्रहसन्निव शङ्करः।<br>सम्प्रेक्ष्य प्रणयाद्विष्णुं कृताञ्जलिपुटं स्थितम्॥ १६९तदनन्तर महादेव शंकरने हाथ जोड़कर [सामने] खड़े विष्णुकी ओर प्रेमपूर्वक देखकर हँसते हुए कहा—
ज्ञातं मयेदमधुना देवकार्यं जनार्दन।<br>सुदर्शनाख्यं चक्रं च ददामि तव शोभनम्॥ १७०हे जनार्दन! अब मैं देवताओंके इस कार्यको जान गया और आपको सुदर्शन नामक उत्तम चक्र प्रदान करता हूँ॥ १६९-१७०॥
यद्रूपं भवता दृष्टं सर्वलोकभयङ्करम्।<br>हिताय तव यत्नेन तव भावाय सुव्रत॥ १७१हे सुव्रत! आपने सभी लोकोंके लिये भयंकर मेरे जिस रूपको देखा है, वह पूर्णरूपसे आपके हित तथा भक्तिभावके लिये है।
शान्तं रणाजिरे विष्णो देवानां दुःखसाधनम्।<br>शान्तस्य चास्त्रं शान्तः स्याच्छान्तेनास्त्रेण किं फलम्॥ १७२हे विष्णो! युद्धभूमिमें सौम्यरूप धारण करना देवताओंके लिये दुःखदायक है। शान्त व्यक्तिका अस्त्र यदि शान्त हो, तो उस शान्त अस्त्रसे कोई फल नहीं होता है।
शान्तस्य समरे चास्त्रं शान्तिरेव तपस्विनाम्।<br>योद्धुः शान्त्या बलच्छेदः परस्य बलवृद्धिदः॥ १७३[केवल] तपस्वीके प्रति युद्धमें शान्त व्यक्तिका अस्त्र शान्त होता है। योद्धाकी शान्तिसे उसकी बलहीनता शत्रुके बलको बढ़ानेवाली होती है।
देवैरशान्तैर्यद्रूपं मदीयं भावयाव्ययम्।<br>किमायुधेन कार्यं वै योद्धुं देवारिसूदन॥ १७४हे देवशत्रुनाशक! अशान्त देवताओंके साथ आप मेरे अव्यय स्वरूपका ध्यान कीजिये; युद्ध करनेके लिये अस्त्रसे क्या प्रयोजन?
क्षमा युधि न कार्या वै योद्धुं देवारिसूदन।<br>अनागते व्यतीते च दौर्बल्ये स्वजनोत्करे॥ १७५<br><br>अकालिके त्वधर्मे च अनर्थे वारिसूदन।<br>एवमुक्त्वा ददौ चक्रं सूर्यायुतसमप्रभम्॥ १७६हे देवारिसूदन! युद्धमें क्षमा नहीं करनी चाहिये। युद्धके लिये अनुपस्थित शत्रु तथा बलशाली स्वजनोंके प्रति और अधर्म-अनर्थकी स्थितिमें अनुपयुक्त समयमें भी क्षमाका आश्रय नहीं लेना चाहिये॥ १७१-१७५ १/२॥
नेत्रं च नेता जगतां प्रभुर्वै पद्मसन्निभम्।<br>तदाप्रभृति तं प्राहुः पद्माक्षमिति सुव्रतम्॥ १७७ऐसा कहकर लोकनायक प्रभु [शिव]-ने उन्हें दस हजार सूर्योंके समान तेजस्वी [सुदर्शन] चक्र तथा कमलसदृश एक नेत्र भी प्रदान किया; उसी समयसे
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