श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| २७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यमं च यमुनाञ्चैव राज्ञी रेवतमेव च।<br>प्रभा प्रभातमादित्याच्छायां संज्ञाप्यकल्पयत् ॥ ४ | आप लोगोंको बताता हूँ। त्वष्टाकी पुत्री संज्ञाने सूर्यसे श्रेष्ठ मनुको उत्पन्न किया। राज्ञीने यम, यमुना तथा रेवतको जन्म दिया। प्रभाने सूर्यसे प्रभातको जन्म दिया। संज्ञाने ही छायाको अपने स्थानपर नियोजित किया॥ २-४॥ |
| छाया च तस्मात्सुषुवे सावर्णिं भास्कराद् द्विजाः।<br>ततः शनिं च तपतीं विष्टिं चैव यथाक्रमम् ॥ ५<br><br>छाया स्वपुत्राभ्यधिकं स्नेहं चक्रे मनौ तदा।<br>पूर्वो मनुर्न चक्षाम यमस्तु क्रोधमूर्च्छितः ॥ ६<br><br>सन्ताडयामास रुषा पादमुद्यम्य दक्षिणम्।<br>यमेन ताडिता सा तु छाया वै दुःखिताभवत् ॥ ७ | हे द्विजो! छायाने उन सूर्यसे सावर्णि मनु, शनि, तपती तथा विष्टिको यथाक्रम जन्म दिया। छाया अपने पुत्र सावर्णि मनुसे अधिक स्नेह करती थी। पूर्व मनु (वैवस्वत मनु) तो इसे सहन कर गये, पर क्रोधसे विक्षुब्ध यम इसे सहन न कर सका और उसने क्रोधसे [अपना] दाहिना पैर उठाकर छायापर प्रहार किया। [पैरसे] यमके द्वारा मारे जानेपर वह छाया दुःखित हुई॥ ५-७॥ |
| छायाशापात्पदं चैकं यमस्य क्लिन्नमुत्तमम्।<br>पूयशोणितसम्पूर्णं कृमीणां निचयान्वितम् ॥ ८<br><br>सोऽपि गोकर्णमाश्रित्य फलकेनानिलाशनः।<br>आराधयन् महादेवं यावद्वर्षायुतायुतम् ॥ ९<br><br>भवप्रसादादागत्य लोकपालत्वमुत्तमम्।<br>पितॄणामाधिपत्यं तु शापमोक्षं तथैव च ॥ १०<br><br>लब्धवान् देवदेवस्य प्रभावाच्छूलपाणिनः। | तब छायाके शापसे यमका वह सुन्दर पैर खराब हो गया, वह मवाद तथा रक्तसे भर गया और कीड़ोंके समूहसे युक्त हो गया। तदनन्तर वह [यम] गोकर्णमें रहकर एक फलक (पटरे)-पर बैठकर [केवल] वायु पीता हुआ दस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना करता रहा। शिवकी कृपासे श्रेष्ठ लोकपालत्व तथा पितरोंका स्वामित्व प्राप्त करके उसने देवदेव शूलपाणि (शिव)-के प्रभावसे शापसे मुक्ति प्राप्त की॥ ८-१० १/२॥ |
| असहन्ती पुरा भानोस्तेजोमयमनिन्दिता ॥ ११<br><br>रूपं त्वाष्ट्री स्वदेहात्तु छायाख्यां सा त्वकल्पयत्।<br>वडवारूपमास्थाय तपस्तेपे तु सुव्रता ॥ १२<br><br>कालात्प्रयत्नतो ज्ञात्वा छायां छायापतिः प्रभुः।<br>वडवामगमत्संज्ञामश्वरूपेण भास्करः ॥ १३<br><br>वडवा च तदा त्वाष्ट्री संज्ञा तस्माद्दिवाकरात्।<br>सुषुवे चाश्विनौ देवौ देवानां तु भिषग्वरौ ॥ १४ | पूर्वकालमें सूर्यके तेजोमय रूपको सहन न करती हुई त्वष्टाकी शुभ कन्या संज्ञाने अपने शरीरसे [दूसरी] छाया नामक स्त्रीकी रचना की और वह सुव्रता स्वयं वडवा (घोड़ी)-का रूप धारणकर तप करने लगी। कुछ समयके बाद प्रयत्नपूर्वक छायाको संज्ञाकी प्रतिकृति जानकर छायापति प्रभु सूर्यने घोड़ेका रूप धारणकर उस वडवारूपधारिणी संज्ञाके साथ रमण किया। तब घोड़ीके रूपवाली त्वष्टापुत्री संज्ञाने उन सूर्यसे देवस्वरूप दोनों अश्विनीकुमारोंको जन्म दिया; वे देवताओंके श्रेष्ठ वैद्य थे॥ ११-१४॥ |
| लिखितो भास्करः पश्चात्संज्ञा पित्रा महात्मना।<br>विष्णोश्चक्रं तु यद् घोरं मण्डलाद्भास्करस्य तु ॥ १५ | उसके बाद महान् आत्मावाले संज्ञापिता [त्वष्टा]-ने सूर्यको खरादा। भगवान् त्वष्टाने रुद्रकी कृपासे सूर्यके मण्डलसे विष्णुके चक्रका निर्माण किया, जो |