श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ६५ ] सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम [ २७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निर्ममे भगवान्स्त्वष्टा प्रधानं दिव्यमायुधम्।<br>रुद्रप्रसादाच्च शुभं सुदर्शनमिति स्मृतम्॥ १६<br>लब्धवान् भगवांश्चक्रं कृष्णः कालाग्निसन्निभम्। | बड़ा भयानक था; वह उनका प्रधान तथा दिव्य अस्त्र था, जिसे शुभ सुदर्शन [चक्र] कहा गया है। भगवान् कृष्णने कालाग्निसदृश उस चक्रको प्राप्त किया था॥ १५-१६१/२॥ |
| मनोस्तु प्रथमस्यासन्नव पुत्रास्तु तत्समाः॥ १७<br>इक्ष्वाकुर्नभगश्चैव धृष्णुः शर्यातिरेव च।<br>नरिष्यन्तश्च वै धीमान् नाभागोऽरिष्ट एव च॥ १८<br>करूषश्च पृषध्रश्च नवैते मानवाः स्मृताः।<br>इला ज्येष्ठा वरिष्ठा च पुंस्त्वं प्राप च या पुरा॥ १९<br>सुद्युम्न इति विख्याता पुंस्त्वं प्राप्ता त्विला पुरा।<br>मित्रावरुणयोस्त्वत्र प्रसादान्मुनिपुङ्गवाः॥ २०<br>पुनः शरवणं प्राप्य स्त्रीत्वं प्राप्तो भवाज्ञया।<br>सुद्युम्नो मानवः श्रीमान् सोमवंशप्रवृद्धये॥ २१<br>इक्ष्वाकोरश्वमेधेन इला किम्पुरुषोऽभवत्।<br>इला किम्पुरुषत्वे च सुद्युम्न इति चोच्यते॥ २२ | प्रथम मनु [वैवस्वत]-के नौ पुत्र हुए, जो उन्हींके समान थे। इक्ष्वाकु, नभग, धृष्णु, शर्याति, नरिष्यन्त, बुद्धिमान् नाभाग, अरिष्ट, करुष तथा पृषध्र—ये नौ मनुपुत्र कहे गये हैं। उनकी ज्येष्ठ तथा वरिष्ठ पुत्री इला जो पूर्वकालमें पुरुष हो गयी थी, वह सुद्युम्न नामसे प्रसिद्ध हुई। हे श्रेष्ठ मुनियो! मित्र तथा वरुणकी कृपासे वह इला पूर्वकालमें पुरुषत्वको प्राप्त हुई थी; पुनः शिवकी आज्ञासे शरवण [नामक वन]-को प्राप्तकर सोमवंशकी वृद्धिके लिये वे मनुपुत्र श्रीमान् सुद्युम्न स्त्रीत्वको प्राप्त हुए। इक्ष्वाकुके अश्वमेधके समय वह इला किंपुरुष (पुरुष रूपवाली) हो गयी थी। वह इला किंपुरुष हो जानेपर 'सुद्युम्न'—इस नामसे कही जाती थी॥ १७-२२॥ |
| मासमेकं पुमान् वीरः स्त्रीत्वं मासमभूतपुनः।<br>इला बुधस्य भवनं सोमपुत्रस्य चाश्रिता॥ २३<br>बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनाय प्रवर्तिता।<br>सोमपुत्राद् बुधाच्चापि ऐलो जज्ञे पुरूरवाः॥ २४<br>सोमवंशाग्रजो धीमान् भवभक्तः प्रतापवान्।<br>इक्ष्वाकोर्वंशविस्तारं पश्चाद्वक्ष्ये तपोधनाः॥ २५ | वह इला एक महीनेतक वीर पुरुषके रूपमें और पुनः एक महीनेतक स्त्रीके रूपमें रहती थी। वह चन्द्रमाके पुत्र बुधके भवनमें रहने लगी। अवसर पाकर वह बुधके साथ मैथुनके लिये तत्पर हुई। तब सोमपुत्र बुध और इलासे पुरूरवा उत्पन्न हुए; जो सोमवंशमें प्रथम उत्पन्न होने वाले, बुद्धिमान्, शिवभक्त तथा प्रतापी थे। हे तपोधनो! अब इसके बाद मैं इक्ष्वाकुवंशके विस्तारका वर्णन करूँगा॥ २३-२५॥ |
| पुत्रत्रयमभूतस्य सुद्युम्नस्य द्विजोत्तमाः।<br>उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वस्तथैव च॥ २६<br>उत्कलस्योत्कलं राष्ट्रं विनताश्वस्य पश्चिमम्।<br>गया गयस्य चाख्याता पुरी परमशोभना॥ २७<br>सुराणां संस्थितिय॑स्यां पितॄणां च सदा स्थितिः। | हे उत्तम द्विजो! उन सुद्युम्नके तीन पुत्र हुए—उत्कल, गय तथा विनताश्व। उत्कलका उत्कल [नामक] राष्ट्र था और विनताश्वका पश्चिमी प्रदेश था। गयकी गया [नामक] परम सुन्दर पुरी कही गयी है, जिसमें देवताओं तथा पितरोंकी स्थिति सर्वदा रहती है॥ २६-२७१/२॥ |
| इक्ष्वाकुज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवान्॥ २८<br>कन्याभावाच्च सुद्युम्नो नैव भागमवाप्तवान्।<br>वसिष्ठवचनाच्चासीत्प्रतिष्ठाने महाद्युतिः॥ २९<br>प्रतिष्ठा धर्मराजस्य सुद्युम्नस्य महात्मनः।<br>तत्पुरूरवसे प्रादाद्राज्यं प्राप्य महायशाः॥ ३० | इक्ष्वाकुके ज्येष्ठ पुत्रने मध्यदेश प्राप्त किया। कन्या प्रकृतिवाले होनेके कारण महातेजस्वी सुद्युम्न [अपना] भाग नहीं पा सके; किंतु वसिष्ठके कहनेसे प्रतिष्ठानपुरमें धर्मराज महात्मा सुद्युम्नकी प्रतिष्ठा स्थापित |