श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६४] वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा २७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रहेन्द्रविष्णुरुद्राद्यैः संवृतः परमेश्वरः।<br>ददौ च दर्शनं तस्मै मुनिपुत्राय धीमते॥ ८८ | ऐसा कहकर [अपने] दिव्य गणों तथा ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, रुद्र आदिसे घिरे हुए भगवान् नीललोहित परमेश्वरने उन बुद्धिमान् मुनिपुत्र [पराशर]-को दर्शन दिया॥ ८७-८८॥ |
| सोऽपि दृष्ट्वा महादेवमानन्दास्त्राविलेक्षणः।<br>निपपात च हृष्टात्मा पादयोस्तस्य सादरम्॥ ८९<br><br>पुनर्भावान्याः पादौ च नन्दिनश्च महात्मनः।<br>सफलं जीवितं मेऽद्य ब्रह्माद्यांस्तांस्तदाह सः॥ ९०<br><br>रक्षार्थमागतस्त्वद्य मम बालेन्दुभूषणः।<br>कोऽन्यः समो मया लोके देवो वा दानवोऽपि वा॥ ९१ | महादेवजीको देखकर आनन्दके अश्रुसे भरे हुए नेत्रोंवाले वे [पराशर] भी प्रसन्नचित्त होकर आदरपूर्वक उनके चरणोंपर गिर पड़े और पुनः भवानी [पार्वती] और महात्मा नन्दीके चरणोंपर गिर पड़े। तत्पश्चात् उन्होंने उन ब्रह्मा आदिसे कहा—'मेरा जीवन आज सफल हो गया। बाल चन्द्रमाके आभूषणवाले [साक्षात् शिवजी] मेरी रक्षाके लिये आज उपस्थित हुए हैं; अतः देवता अथवा दानव—दूसरा कौन इस लोकमें मेरे समान [भाग्यशाली] है'॥ ८९-९१॥ |
| अथ तस्मिन् क्षणादेव ददर्श दिवि संस्थितम्।<br>पितरं भ्रातृभिः सार्धं शाक्तेयस्तु पराशरः॥ ९२<br><br>सूर्यमण्डलसङ्काशे विमाने विश्वतोमुखे।<br>भ्रातृभिः सहितं दृष्ट्वा ननाम च जहर्ष च॥ ९३ | तदनन्तर शक्तिपुत्र पराशरने उसी क्षण [अपने] पिताको भाइयोंसहित अन्तरिक्षमें खड़े देखा। सूर्यमण्डलके समान [तेजवाले] तथा सभी ओर मुखवाले विमानमें [अपने] भाइयोंसहित पिताको देखकर उन्होंने प्रणाम किया और वे बहुत हर्षित हुए॥ ९२-९३॥ |
| तदा वृषभध्वजो देवः सभार्यः सगणेश्वरः।<br>वसिष्ठपुत्रं प्राहेदं पुत्रदर्शनतत्परम्॥ ९४ | तब अपनी भार्या तथा गणेश्वरोंसहित विराजमान भगवान् वृषभध्वज (शिव) पुत्रको देखनेमें तत्पर वसिष्ठ-पुत्र [शक्ति]-से यह कहने लगे॥ ९४॥ |
| श्रीदेव उवाच<br>शक्ते पश्य सुतं बालमानन्दास्त्राविलेक्षणम्।<br>अदृश्यन्तीं च विप्रेन्द्र वसिष्ठं पितरं तव॥ ९५<br><br>अरुन्धतीं महाभागां कल्याणीं देवतोपमाम्।<br>मातरं पितरं चोभौ नमस्कुरु महामते॥ ९६ | **श्रीदेव बोले—**हे शक्ते! हे विप्रेन्द्र! आनन्दके आँसुओंसे सिक्त नेत्रोंवाले अपने पुत्र इस बालकको और अदृश्यन्ती, अपने पिता वसिष्ठ, महाभाग्यशालिनी-कल्याणमयी तथा देवतातुल्य [माता] अरुन्धतीको देखो। हे महामते! [अपने] माता तथा पिता—इन दोनोंको नमस्कार करो॥ ९५-९६॥ |
| तदा हरं प्रणम्याशु देवदेवमुमां तथा।<br>वसिष्ठं च तदा श्रेष्ठं शक्तिर्वै शङ्कराज्ञया॥ ९७<br><br>मातरं च महाभागां कल्याणीं पतिदेवताम्।<br>अरुन्धतीं जगन्नाथनियोगात्प्राह शक्तिमान्॥ ९८ | तदनन्तर शंकरजीकी आज्ञासे देवदेव हरको, उमाको, श्रेष्ठ वसिष्ठको तथा अपने पतिको देवता माननेवाली महाभाग्यवती कल्याणी माता अरुन्धतीको शीघ्र प्रणाम करके शक्तिमान् शक्तिने [पुनः] जगन्नाथ [शिव]-की आज्ञा पाकर कहा॥ ९७-९८॥ |
| वासिष्ठ उवाच<br>भो वत्स वत्स विप्रेन्द्र पराशर महाद्युते।<br>रक्षितोऽहं त्वया तात गर्भस्थेन महात्मना॥ ९९ | **वासिष्ठ (शक्ति) बोले—**हे वत्स! हे वत्स! हे विप्रेन्द्र! हे पराशर! हे महाद्युते! हे तात! गर्भमें स्थित रहते हुए तुम महात्माने मेरी रक्षा की। हे वत्स! हे |
| अणिमादिगुणैश्वर्यं मया वत्स पराशर।<br>लब्धमद्याननं दृष्टं तव बाल ममाज्ञया॥ १०० |