श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ३८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| लिये हुए ब्रह्मवादी लोगोंका वध नहीं करना चाहिये; वे पापकर्ममें लगे रहनेपर भी सदा पूज्य हैं॥ १४—१६ १/२॥ | |
| न हन्तव्याः सदा पूज्याः पापकर्मरता अपि।<br>पवित्रास्तु स्त्रियः सर्वा अत्रेश्च कुलसम्भवाः॥ १७<br><br>ब्रह्महत्यासमं पापमात्रेयीं विनिहत्य च।<br>स्त्रियः सर्वा न हन्तव्याः पापकर्मरता अपि॥ १८<br><br>न यज्ञार्थं स्त्रियो ग्राह्याः सर्वैः सर्वत्र सर्वदा।<br>सर्ववर्णेषु विप्रेन्द्राः पापकर्मरता अपि॥ १९<br><br>मलिना रूपवत्यश्च विरूपा मलिनाम्बराः।<br>न हन्तव्याः सदा मर्त्यैः शिववच्छ्रद्धया तथा॥ २० | अत्रिके कुलमें उत्पन्न सभी स्त्रियाँ पवित्र होती हैं। अत्रिवंशकी स्त्रीकी हत्या करनेपर ब्रह्महत्याके समान पाप लगता है, अतः पापकर्ममें रत होनेपर भी उन स्त्रियोंकी हत्या नहीं करनी चाहिये। सभी लोगोंको चाहिये कि यज्ञहेतु सर्वत्र सर्वदा स्त्रियोंको ग्रहण न करें; हे विप्रेन्द्रो! सभी वर्णोंकी स्त्रियाँ चाहे वे पापकर्ममें रत हों, मलिन हों, रूपवती हों, कुरूप हों अथवा मलिन वस्त्रोंवाली हों, मनुष्योंके द्वारा वध्य नहीं हैं; उनमें शिवभाव रखना चाहिये॥ १७—२०॥ |
| वेदबाह्यव्रताचाराः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः।<br>पाषण्डिन इति ख्याता न सम्भाष्या द्विजातिभिः॥ २१<br><br>न स्प्रष्टव्या न द्रष्टव्या दृष्ट्वा भानुं समीक्षते।<br>तथापि ते न वध्याश्च नृपैरन्यैश्च जन्तुभिः॥ २२ | वेदविरुद्ध व्रत तथा आचारवाले और श्रुति तथा स्मृतिसे विमुख लोग पाखण्डरी कहे गये हैं। द्विजातियोंको उनके साथ बातचीत नहीं करनी चाहिये, उनका स्पर्श नहीं करना चाहिये और उन्हें देखना नहीं चाहिये; उन्हें देखनेपर सूर्यका दर्शन करना चाहिये; फिर भी राजाओं तथा अन्य प्राणियोंको चाहिये कि उनका वध न करें॥ २१–२२॥ |
| प्रसङ्गादपि यो मर्त्यः सतां सकृदहो द्विजाः।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति समभ्यर्च्य महेश्वरम्॥ २३<br><br>भवन्ति दुःखिताः सर्वे निर्दया मुनिसत्तमाः।<br>भक्तिहीना नराः सर्वे भवे परमकारणे॥ २४<br><br>ये भक्ता देवदेवस्य शिवस्य परमेष्ठिनः।<br>भाग्यवन्तो विमुच्यन्ते भुक्त्वा भोगानिहैव ते॥ २५ | हे द्विजो! मनुष्य सज्जनोंके संसर्गवश एक बार भी महेश्वरका पूजन करके रुद्रलोक प्राप्त कर लेता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! सभी दयारहित लोग तथा परमकारण शिवमें भक्तिसे हीन सभी मनुष्य दुःख भोगते हैं। जो लोग देवदेव परमेष्ठी शिवके भक्त हैं, वे भाग्यशाली हैं और इस लोकमें सुखोंको भोगकर मुक्त हो जाते हैं॥ २३–२५॥ |
| पुत्रेषु दारेषु गृहेषु नृणां<br>भक्तं यथा चित्तमथादिदेवे।<br>सकृत्प्रसङ्गाद्यतितापसानां<br>तेषां न दूरः परमेशलोकः॥ २६ | जैसे [गृहस्थ] मनुष्योंका चित्त पुत्रों, स्त्रियों तथा घरोंमें आसक्त रहता है, उसी प्रकार उनका चित्त यदि यतियों तथा तपस्वियोंके सान्निध्यसे एक बार भी आदिदेवमें लग जाय तो परमेश्वरका लोक उनके लिये दूर नहीं है॥ २६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भक्तिमहिमावर्णनं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भक्तिमहिमावर्णन' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥