श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८० ] देवताओंका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना ३८७
| दत्त्वा कुलशतं साग्रं शिवलोके महीयते।<br>आयसं ताम्रजं वापि रौप्यं सौवर्णिकं तथा॥ २९<br><br>शिवाय दीपं यो दद्याद्विधिना वापि भक्तितः।<br>सूर्यायुतसमैः श्लक्ष्णैर्यानैः शिवपुरं व्रजेत्॥ ३०<br><br>कार्तिके मासि यो दद्याद् घृतदीपं शिवाग्रतः।<br>सम्पूज्यमानं वा पश्येद्विधिना परमेश्वरम्॥ ३१<br><br>स याति ब्रह्मणो लोकं श्रद्धया मुनिसत्तमाः।<br>आवाहनं सुसान्निध्यं स्थापनं पूजनं तथा॥ ३२<br><br>सम्प्रोक्तं रुद्रगायत्र्या आसनं प्रणवेन वै।<br>पञ्चभिः स्नपनं प्रोक्तं रुद्राद्यैश्च विशेषतः॥ ३३<br><br>एवं सम्पूजयेन्नित्यं देवदेवमुमापतिम्।<br>ब्रह्माणं दक्षिणे तस्य प्रणवेन समर्चयेत्॥ ३४<br><br>उत्तरे देवदेवेशं विष्णुं गायत्रिया यजेत्।<br>वह्नौ हुत्वा यथान्यायं पञ्चभिः प्रणवेन च॥ ३५<br><br>स याति शिवसायुज्यमेवं सम्पूज्य शङ्करम्।<br>इति सङ्क्षेपतः प्रोक्तो लिङ्गार्चनविधिक्रमः॥ ३६<br><br>व्यासेन कथितः पूर्वं श्रुत्वा रुद्रमुखात्स्वयम्॥ ३७ | करता है। शिवालयमें मिट्टी अथवा लकड़ीका बना हुआ दीपवृक्ष (दीवट) प्रदान करके मनुष्य आगेके सौ कुलोंसहित शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो विधानके अनुसार भक्तिपूर्वक लोहे, ताँबे, चाँदी अथवा सोनेका बना हुआ दीपक शिवको समर्पित करता है, वह दस हजार सूर्योंके समान देदीप्यमान विमानोंसे शिवलोकको जाता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! जो कार्तिक महीनेमें शिवके सामने घृतका दीपक समर्पित करता है अथवा विधानके साथ पूजित होते हुए परमेश्वरका दर्शन श्रद्धापूर्वक करता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है॥ २७-३१½॥<br><br>[शिवका] आवाहन, उत्तम सान्निध्य, स्थापन तथा पूजन रुद्रगायत्री [मन्त्र]-द्वारा और आसन प्रणव-द्वारा बताया गया है। [सद्योजात आदि] पाँच मन्त्रोंसे तथा विशेषरूपसे रुद्रमन्त्रोंसे उनका स्नान बताया गया है। इस प्रकार देवदेव उमापतिकी पूजा नित्य करे। उनके दक्षिणमें ब्रह्माकी पूजा प्रणवसे करे और उत्तरमें देवदेवेश विष्णुकी पूजा गायत्री [मन्त्र]-से करे। विधिके अनुसार [सद्योजात आदि] पाँच मन्त्रोंसे तथा प्रणवसे अग्निमें होम करे। इस प्रकार शंकरकी भलीभाँति पूजा करके वह [मनुष्य] शिवसायुज्य प्राप्त करता है। [हे ऋषियो!] मैंने संक्षेपमें लिङ्गार्चनविधिका क्रम बता दिया; पहले स्वयं रुद्रके मुखसे इसे सुनकर व्यासजीने मुझको बताया था॥ ३२-३७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवार्चनविधिर्नमैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवार्चनविधि' नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७९ ॥
अस्सीवाँ अध्याय
देवताओंका कैलासपुरी आकर वहाँ विराजमान उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना तथा भगवान् शिवद्वारा देवताओंको पाशुपतव्रतका उपदेश प्रदान करना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| कथं पशुपतिं दृष्ट्वा पशुपाशविमोक्षणम्।<br>पशुत्वं तत्यजुर्देवास्तन्नो वक्तुमिहार्हसि॥ १ | [हे सूतजी!] पशुपतिका दर्शन करके पशुपाशसे मुक्ति किस प्रकार होती है; देवताओंने पशुत्वका कैसे त्याग किया? इसे आप कृपा करके हम लोगोंको बतायें॥ १॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| पुरा कैलासशिखरे भोग्याख्ये स्वपुरे स्थितम्।<br>समेत्य देवाः सर्वज्ञमाजग्मुस्तत्प्रसादतः॥ २ | पूर्वकालमें कैलास-शिखरपर भोग्य नामक अपने पुरमें स्थित सर्वज्ञ शिवके पास सभी देवता |