श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ८० ] | देवताओंका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना | ३८९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अथ जाम्बूनदमयैर्भवनैर्मणिभूषितैः ।<br>विमानैर्विविधाकारैः प्राकारैश्च समावृतम् ॥ १३<br>दृष्ट्वा शम्भोः पुरं बाह्यं देवैः सब्रह्मकैर्हरिः ।<br>प्रहृष्टवदनो भूत्वा प्रविवेश ततः पुरम् ॥ १४<br>हर्म्यप्रासादसम्बार्धं महाट्टालसमन्वितम् ।<br>द्वितीयं देवदेवस्य चतुर्द्वारं सुशोभनम् ॥ १५<br>वज्रवैडूर्यमाणिक्यमणिजालैः समावृतम् ।<br>दोलाविक्षेपसंयुक्तं घण्टाचामरभूषितम् ॥ १६<br>मृदङ्गमुरजैर्जुष्टं वीणावेणुनिनादितम् ।<br>नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैर्भूतसङ्घैश्च संवृतम् ।<br>देवेन्द्रभवनाकारैर्भवनैर्दृष्टिमोहनैः ॥ १७ | तदनन्तर सुवर्णमय भवनों, मणिभूषित विमानों तथा अनेक आकारवाले प्राकारों (चहारदीवारियों)-से घिरे हुए शिवके बाहरी पुरको देखकर प्रसन्नमुख होकर विष्णुने ब्रह्मसहित सभी देवताओंके साथ देवदेवके उस दूसरे पुरमें प्रवेश किया; जो विशाल भवनों तथा महलोंसे अवरुद्ध, ऊँची अट्टालिकाओंसे समन्वित, चार द्वारोंवाला, परम सुन्दर, हीरा-वैडूर्य-माणिक्य-मणियोंके जालोंसे आवृत, आन्दोलित हो रहे हिण्डोलोंसे समन्वित, घण्टा तथा चामरसे विभूषित, मृदंग-मुरज आदि वाद्ययन्त्रोंसे परिपूर्ण, वीणा-वेणुसे निनादित, नृत्य करती हुई अप्सराओं तथा भूतगणोंसे घिरा हुआ और दृष्टिको मोह लेनेवाले देवेन्द्रभवनके आकारवाले भवनोंसे मण्डित था॥ १३–१७॥ |
| प्रासादशृङ्गेष्वथ पौरनार्यः<br>सहस्रशः पुष्पफलाक्षताद्यैः ।<br>स्थिताः करैस्तस्य हरेः समन्तात्<br>प्रचिक्षिपुर्मूर्ध्नि यथा भवस्य ॥ १८<br>दृष्ट्वा नार्यस्तदा विष्णुं मदाघूर्णितलोचनाः ॥ १९<br>विशालजघनाः सद्यो ननृतुर्मुमुदुर्जगुः ।<br>काश्चिद् दृष्ट्वा हरिं नार्यः किञ्चित्प्रहसिताननाः ॥ २०<br>किञ्चिद्विस्रस्तवस्त्राश्च स्रस्तकाञ्चीगुणा जगुः । | [तीसरे पुरमें प्रवेश करनेपर] महलोंके शिखरोंपर विराजमान हजारों पुरस्त्रियाँ [अपने] हाथोंसे सभी ओरसे शिवकी भाँति विष्णुके मस्तकपर भी पुष्प, फल, अक्षत आदिकी वर्षा करने लगीं। उस समय विष्णुको देखकर मदसे घूर्णित नेत्रोंवाली तथा विशाल जाँघोंवाली स्त्रियाँ शीघ्र ही आनन्दमग्न हो गयीं और वे नाचने तथा गाने लगीं। विष्णुको देखकर कुछ स्त्रियोंका मुखमण्डल मन्द मुसकानसे भर गया, कुछके वस्त्र शिथिल हो गये और कुछकी करधनी ढीली पड़ गयी; वे सब गीत गाने लगीं॥ १८–२०१/२॥ |
| चतुर्थं पञ्चमं चैव षष्ठं च सप्तमं तथा ॥ २१<br>अष्टमं नवमं चैव दशमं च पुरोत्तमम् ।<br>अतीत्यासाद्य देवस्य पुरं शम्भोः सुशोभनम् ॥ २२<br>सुवृत्तं सुतरां शुभ्रं कैलासशिखरे शुभे ।<br>सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैश्च विभूषितम् ॥ २३<br>स्फाटिकैर्मण्डपैः शुभ्रैर्जाम्बूनदमयैस्तथा ।<br>नानारत्नमयैश्चैव दिग्विधिक्षु विभूषितम् ॥ २४<br>गोपुरैर्गोपतेः शम्भोर्नानाभूषणभूषितैः ।<br>अनेकैः सर्वतोभद्रैः सर्वरत्नमयैस्तथा ॥ २५<br>प्राकारैर्विविधाकारैरष्टाविंशतिभिर्वृतम् ।<br>उपद्वारैर्महाद्वारैर्विदिक्षु विविधैर्दृढैः ॥ २६<br>गुह्यालयैर्गुह्यगृहैर्गुह्यस्य भवनैः शुभैः ।<br>ग्राम्यैर्नयैर्महाभागा मौक्तिकैर्दृष्टिमोहनैः ॥ २७ | हे महाभागो! तदनन्तर चौथे, पाँचवें, छठें, सातवें, आठवें, नौवें तथा दसवें उत्तम पुरोंको क्रमसे पार करके शुभ कैलास-शिखरपर [स्थित] देवदेव गोपति परमेश्वर भगवान् शिवके परम सुन्दर; पूर्ण गोलाकार; सूर्यमण्डलके समान भवनोंसे विभूषित; स्फटिकके शुभ्र मण्डपोंसे शोभायमान; सभी दिशाओंमें सुवर्णमय तथा विविध रत्नमय फाटकोंसे विभूषित; विविध आभूषणोंसे अलंकृत, अनेक सर्वतोभद्रोंसे युक्त; अनेक आकारवाले रत्नजटित अट्ठाईस प्राकारों (चहारदीवारियों)-से घिरे हुए; उपदिशाओंमें अनेक प्रकारके दृढ़ उपद्वारों तथा महाद्वारोंसे युक्त; गुह (कार्तिकेय)-के गुप्त भवनों |