भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 393

अध्याय ८०] देवताओँका कैलासपुरी आकर उमासहित भगवान् शिवके दर्शन करना ३९१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्ट्वाथ वृन्दं सुरसुन्दरीणां गणेश्वराणां सुरसुन्दरीणाम्।<br>जग्मुर्गणेशस्य पुरं सुरेशाः पुरद्विषः शक्रपुरोगमाश्च॥ ४२देवताओंकी सुन्दर स्त्रियों तथा गणेश्वरोंकी सुन्दर स्त्रियोंको देखकर इन्द्र आदि प्रमुख देवता त्रिपुरके शत्रु गणाधीशके पुरमें गये॥ ४२ ॥
दृष्ट्वा च तस्थुः सुरसिद्धसङ्घाः पुरस्य मध्ये पुरुहूतपूर्वाः।<br>भवस्य बालार्कसहस्रवर्णं विमानमाद्यं परमेश्वरस्य॥ ४३[उस] पुरके मध्यमें स्थित परमेश्वर शिवके हजारों उगते हुए सूर्यके समान आभावाले भवनको देखकर इन्द्रसहित देवता तथा सिद्धगण वहाँ रुक गये॥ ४३ ॥
अथ तस्य विमानस्य द्वारि संस्थं गणेश्वरम्।<br>नन्दिनं ददृशुः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः॥ ४४इसके बाद इन्द्र आदि सभी देवताओंने उस भवनके द्वारपर स्थित गणेश्वर नन्दीको देखा॥ ४४ ॥
तं दृष्ट्वा नन्दिनं सर्वे प्रणम्याहुर्गणेश्वरम्।<br>जयेति देवास्तं दृष्ट्वा सोऽप्याह च गणेश्वरः॥ ४५<br>भो भो देवा महाभागाः सर्वे निर्धूतकल्मषाः।<br>सम्प्राप्ताः सर्वलोकेशा वक्तुमर्हथ सुव्रताः॥ ४६उन गणेश्वर नन्दीको देखकर सभी देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और कहा—'जय हो'। तब गणेश्वरने भी उन्हें देखकर कहा—'हे महाभाग्यशाली देवताओ! हे सुव्रतो! निष्पाप तथा सभी लोकोंके स्वामी आपलोग किसलिये आये हैं; कृपा करके बतायें॥ ४५-४६॥
तमाहुर्वरदं देवं वारणेन्द्रसमप्रभम्।<br>पशुपशविमोक्षार्थं दर्शयास्मान् महेश्वरम्॥ ४७तत्पश्चात् देवताओंने उनसे कहा—'पशुपाश (जीवभाव)-से मुक्तिके लिये आप हमलोगोंको गजराज (ऐरावत)-के समान शुभ्र कान्तिवाले एवं वर प्रदान करनेवाले देव महेश्वरका दर्शन कराइये॥ ४७॥
पुरा पुरत्रयं दग्धुं पशुत्वं परिभाषितम्।<br>शङ्किताश्च वयं तत्र पशुत्वं प्रति सुव्रत॥ ४८हे सुव्रत! पूर्वकालमें तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये पशुत्व स्वीकार किया गया था; उस पशुत्वके विषयमें हमलोग शंकाग्रस्त हैं॥ ४८॥
व्रतं पाशुपतं प्रोक्तं भवेन परमेष्ठिना।<br>व्रतेनानेन भूतेश पशुत्वं नैव विद्यते॥ ४९<br>अथ द्वादशवर्षं वा मासद्वादशकं तु वा।<br>दिनद्वादशकं वापि कृत्वा तद् व्रतमुत्तमम्॥ ५०<br>मुच्यन्ते पशवः सर्वे पशुपाशैर्भवस्य तु।परमेश्वर शिवके द्वारा पाशुपतव्रत कहा गया है; हे भूतेश! इस व्रतके करनेसे पशुत्व नहीं रहता है। बारह वर्षोंतक, बारह महीनोंतक अथवा बारह दिनोंतक भी उस उत्तम व्रतको करके समस्त पशु [भगवान्] शिवके पशुपाशोंसे मुक्त हो जाते हैं॥ ४९-५० १/२॥
दर्शयामास तान् देवान्नारायणपुरोगमान्॥ ५१<br>नन्दी शिलादतनयः सर्वभूतगणाग्रणीः।<br>तं दृष्ट्वा देवमीशानं साम्बं सगणमव्ययम्॥ ५२<br>प्रणेमुस्तुष्टुवुश्चैव प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>विज्ञाप्य शितिकण्ठाय पशुपाशविमोक्षणम्॥ ५३<br>तस्थुस्तदग्रतः शम्भोः प्रणिपत्य पुनः पुनः।तदनन्तर सभी भूतगणोंमें अग्रणी शिलादपुत्र नन्दीने नारायण आदि उन देवताओंको [शिवका] दर्शन कराया। तब उमा तथा गणोंसहित उन सनातन प्रभु ईशानका दर्शन करके प्रीतिके कारण रोमांचित देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति की तथा [उन] शितिकण्ठ (शिव)-से पशुपाशसे मुक्तिका निवेदन करके बार-बार प्रणामकर उन शम्भुके सामने वे खड़े हो गये॥ ५१—५३ १/२॥
ततः सम्प्रेक्ष्य तान् सर्वान् देवदेवो वृषध्वजः॥ ५४तत्पश्चात् उन सबकी ओर देखकर देवदेव, वृषभध्वज, परमेश्वर भगवान् महेश्वर उन देवताओं तथा
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