श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८२ ] सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव ३१७
बयासीवाँ अध्याय
सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव और उसके पाठका फल
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>व्यपोहनस्तवं वक्ष्ये सर्वसिद्धिप्रदं शुभम्।<br>नन्दिनश्च मुखाच्छ्रुत्वा कुमारेण महात्मना ॥ १<br>व्यासाय कथितं तस्माद् बहुमानेन वै मया।<br>नमः शिवाय शुद्धाय निर्मलाय यशस्विने ॥ २<br>दुष्टान्तकाय सर्वाय भवाय परमात्मने।<br>पञ्चवक्त्रो दशभुजो ह्यक्षपञ्चदशैर्युतः ॥ ३<br>शुद्धस्फटिकसङ्काशः सर्वाभरणभूषितः।<br>सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सर्वोपरि सुसंस्थितः ॥ ४<br>पद्मासनस्थः सोमेशः पापमाशु व्यपोहतु। | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले मंगलमय व्यपोहनस्तवको बताऊँगा; इसे नन्दीके मुखसे सुनकर महात्मा सनत्कुमारने व्यासजीको बताया और उनसे परम आदरपूर्वक मैंने सुना। कल्याणकारी, शुद्ध, निर्मल, यशस्वी, दुष्टोंका नाश करनेवाले, सर्व, भव तथा परमात्माको नमस्कार है। पाँच मुखोंवाले, दस भुजाओंवाले, पन्द्रह नेत्रोंसे युक्त, शुद्ध स्फटिकके सदृश कान्तिमान्, सभी आभूषणोंसे विभूषित, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, शान्त, सबसे ऊपर प्रतिष्ठित तथा पद्मासनपर स्थित उमासहित भगवान् शिव पापको शीघ्र दूर करें॥ १-४ १/२ ॥ |
| ईशानः पुरुषश्चैव अघोरः सद्य एव च ॥ ५<br>वामदेवश्च भगवान् पापमाशु व्यपोहतु।<br>अनन्तः सर्वविद्येशः सर्वज्ञः सर्वदः प्रभुः ॥ ६<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु।<br>सूक्ष्मः सुरासुरेशानो विश्वेशो गणपूजितः ॥ ७<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु।<br>शिवोत्तमो महापूज्यः शिवध्यानपरायणः ॥ ८<br>सर्वगः सर्वदः शान्तः स मे पापं व्यपोहतु।<br>एकाक्षो भगवानीशः शिवार्चनपरायणः ॥ ९<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु। | ईशान, तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात तथा भगवान् वामदेव पापको शीघ्र दूर करें। वे अनन्त, सर्वविद्येश, सर्वज्ञ, सर्वद, प्रभु तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पापको दूर करें। वे सूक्ष्म, सुरासुरेशान, विश्वेश, गणपूजित तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पापको दूर करें। वे शिवोत्तम, महापूज्य, शिवध्यानपरायण, सर्वग, सर्वद तथा शान्त मेरे पापको दूर करें। वे एकाक्ष, भगवान्, ईश, शिवार्चन-परायण तथा शिवध्यानैकसम्पन्न सदा मेरे पापको दूर करें॥ ५-९ १/२ ॥ |
| त्रिमूर्तिर्भगवानीशः शिवभक्तिप्रबोधकः ॥ १०<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु।<br>श्रीकण्ठः श्रीपतिः श्रीमान् शिवध्यानरतः सदा ॥ ११<br>शिवार्चनरतः साक्षात् स मे पापं व्यपोहतु।<br>शिखण्डी भगवान् शान्तः शवभस्मानुलेपनः ॥ १२<br>शिवार्चनरतः श्रीमान् स मे पापं व्यपोहतु। | वे त्रिमूर्ति, भगवान्, ईश, शिवभक्तिप्रबोधक तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पापको दूर करें। वे श्रीकण्ठ, श्रीपति, श्रीमान्, सदा शिवध्यानरत तथा शिवार्चनरत मेरे पापको दूर करें। वे शिखण्डी, भगवान्, शान्त, शवभस्मानुलेपन, शिवार्चनरत तथा श्रीमान् मेरे पापको दूर करें॥ १०-१२ १/२ ॥ |
| त्रैलोक्यनमिता देवी सोल्काकारा पुरातनी ॥ १३<br>दाक्षायणी महादेवी गौरी हैमवती शुभा।<br>एकपर्णाग्रजा सौम्या तथा वै चैकपाटला ॥ १४<br>अपर्णा वरदा देवी वरदानैकतत्परा।<br>उमासुरहरा साक्षात्कौशिकी वा कपर्दिनी ॥ १५ | जो तीनों लोकोंद्वारा नमस्कृत, उल्काके आकारवाली, सनातनी देवी, दक्षकन्या, महादेवी, गौरी, हिमालयपुत्री, कल्याणमयी, एकपर्णा, अग्रजा, सौम्या, एकपाटला, अपर्णा, वरदायिनी, वरप्रदान करनेमें सदा तत्पर, उमा, असुरोंका संहार करनेवाली साक्षात् कौशिकी, कपर्दिनी, |