श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 604, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 604
६०२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| [चित्र: असफलता]<br><br>रात्रौ रात्रौ गृहे यस्मिन् कलहो वर्तते मिथः।<br>अनया सार्धमनिशं विश त्वं भयवर्जितः॥ ३९ | जिस घरमें रात्रि-वेलामें [लोगोंके बीच] परस्पर कलह होता हो, वहाँ तुम भयमुक्त होकर इसके साथ निरन्तर निवास करो॥ ३८-३९॥ |
| लिङ्गार्चनं यस्य नास्ति यस्य नास्ति जपादिकम्।<br>रुद्रभक्तिर्विन्निन्दा च तत्रैव विश निर्भयः॥ ४०<br>अतिथिः श्रोत्रियो वापि गुरुर्वा वैष्णवोऽपि वा।<br>न सन्ति यद्गृहे गावः सभार्यस्त्वं समाविश॥ ४१ | जिसके यहाँ शिवलिङ्गका पूजन न होता हो तथा जिसके यहाँ जप आदि न होते हों, अपितु रुद्रभक्तिकी निन्दा होती हो, वहींपर तुम निर्भय होकर प्रवेश करो। जिस घरमें अतिथि, श्रोत्रिय (वैदिक), गुरु, विष्णुभक्त और गायें न हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित निवास करो॥ ४०-४१॥ |
| बालानां प्रेक्षमाणानां यत्रादत्त्वा त्वभक्षयन्।<br>भक्ष्याणि तत्र संहृष्टः सभार्यस्त्वं समाविश॥ ४२<br>अनभ्यर्च्य महादेवं वासुदेवमथापि वा।<br>अहुत्वा विधिवद्यत्र तत्र नित्यं समाविश॥ ४३ | जहाँ बालकोंके देखते रहनेपर उन्हें बिना दिये ही लोग भक्ष्य पदार्थ स्वयं खा जाते हों, उस स्थानपर तुम प्रसन्न होकर सपत्नीक प्रवेश करो। महादेव अथवा भगवान् विष्णुका पूजन न करके तथा विधिपूर्वक हवन न करके जहाँ लोग रहते हों, वहाँ तुम सदा निवास करो॥ ४२-४३॥ |
| पापकर्मरता मूढा दयाहीनाः परस्परम्।<br>गृहे यस्मिन् समासन्ते देशे वा तत्र संविश॥ ४४<br>प्राकारागारविध्वंसा न चैवेड्या कुटुम्बिनी।<br>तद्गृहं तु समासाद्य वस नित्यं हि हृष्टधीः॥ ४५ | जिस घरमें या देशमें पापकृत्यमें संलग्न रहनेवाले, मूर्ख तथा दयाहीन लोग रहते हों, वहाँपर तुम प्रवेश करो। घर और घरकी चहारदीवारीको तोड़नेवाली अर्थात् घरकी मान-मर्यादाको भंग करनेवाली, दुःशीलताके कारण किसी भी प्रकार प्रसन्न न होनेवाली गृहिणी जिस घरमें हो, उस घरमें प्रसन्न मनसे सदा निवास करो॥ ४४-४५॥ |
| यत्र कण्टकिनो वृक्षा यत्र निष्पाववल्लरी।<br>ब्रह्मवृक्षश्च यत्रास्ति सभार्यस्त्वं समाविश॥ ४६<br>अगस्त्यार्कादयो वापि बन्धुजीवो गृहेषु वै।<br>करवीरो विशेषेण नन्द्यावर्तमथापि वा॥ ४७<br>मल्लिका वा गृहे येषां सभार्यस्त्वं समाविश।<br>कन्या च यत्र वै वल्ली द्रोही वा च जटी गृहे॥ ४८<br>बहुला कदली यत्र सभार्यस्त्वं समाविश।<br>तालं तमालं भल्लातं तित्तिडीखण्डमेव च॥ ४९<br>कदम्बः खादिरं वापि सभार्यस्त्वं समाविश।<br>न्यग्रोधं वा गृहे येषामश्वत्थं चूतमेव वा॥ ५० | जहाँ काँटेदार वृक्ष हों, जहाँ निष्पाव (सेम आदि)-की लता हो और जहाँ पलाशका वृक्ष हो, वहाँ तुम अपनी पत्नीसहित निवास करो। जिनके घरोंमें अगस्त्य, आक आदि दूधवाले वृक्ष, बन्धुजीव (गुलदपहरिया)-का पौधा, विशेषरूपसे करवीर, नन्द्यावर्त (तगर) और मल्लिकाके वृक्ष हों, उनके घरोंमें तुम पत्नीके साथ प्रवेश करो। जिस घरमें अपराजिता, अजमोदा, निम्ब, जटामांसी, बहुला (नीलका पौधा), केलेके वृक्ष हों, वहाँपर तुम सपत्नीक प्रवेश करो। जहाँ ताल, तमाल, भल्लात (भिलावा), इमली, कदम्ब और खैरके वृक्ष हों, वहाँ तुम अपनी भार्याके साथ प्रवेश करो। जिनके घरोंमें बरगद, पीपल, आम, गूलर तथा |