श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय १३] भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपोंका वर्णन ६२७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शरीरस्थं च भूतानां शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी।<br>शम्भोर्विश्वम्भरा मूर्तिः सर्वब्रह्माधिदेवता ॥ ४०<br><br>चराचराणां भूतानां सर्वेषां धारणे मता।<br>चराचराणां भूतानां शरीराणि विदुर्बुधाः ॥ ४१<br><br>पञ्चकेनेशमूर्तीनां समारब्धानि सर्वथा।<br>पञ्चभूतानि चन्द्राकार्वात्मेति मुनिपुङ्गवाः ॥ ४२<br><br>मूर्तयोऽष्टौ शिवस्याहुर्देवदेवस्य धीमतः।<br>आत्मा तस्याष्टमी मूर्तिर्यजमानाह्वया परा ॥ ४३<br><br>चराचरशरीरेषु सर्वेष्वेव स्थिता तदा।<br>दीक्षितं ब्राह्मणं प्राहूरात्मानं च मुनीश्वराः ॥ ४४<br><br>यजमानाह्वया मूर्तिः शिवस्य शिवदायिनः।<br>मूर्तयोऽष्टौ शिवस्यैता वन्दनीयाः प्रयत्नतः ॥ ४५<br><br>श्रेयोऽर्थिभिर्नरैर्नित्यं श्रेयसामेकहेतवः ॥ ४६ | ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर स्थित और प्राणियोंके देहमें स्थित जो आकाश है, वह सर्वव्यापी शम्भुकी ही महिमायुक्त मूर्ति है। भगवान् शिवकी धरारूप मूर्ति सभी ब्राह्मणोंकी मुख्य देवता है तथा समस्त चराचर प्राणियोंको धारण करनेवाली कही गयी है ॥ ३९-४० १/२ ॥<br><br>स्थावर-जंगम प्राणियोंके शरीर भगवान् शिवकी मूर्तियोंके [पृथ्वी, जल आदि] पंचमहाभूत समुदायसे सम्यक् उत्पन्न किये गये हैं—ऐसा विद्वानोंने कहा है। श्रेष्ठ मुनियोंने बताया है कि पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश), चन्द्र, सूर्य और आत्मा—ये ही देवदेव धीमान्की आठ मूर्तियाँ हैं। उन शिवकी जो आठवीं श्रेष्ठ मूर्ति आत्मा है, वह यजमान नामवाली भी है; यह सभी चराचर प्राणियोंके शरीरोंमें सदा स्थित रहती है। मुनीश्वरोंने दीक्षित ब्राह्मणको भी आत्मा कहा है। इसे ही कल्याणकारी शिवकी यजमान नामक मूर्ति कहा गया है। अपने कल्याणकी कामना करनेवाले मनुष्योंको शिवकी इन कल्याणकी साधनभूता अष्टमूर्तियोंकी प्रयत्नपूर्वक नित्य वन्दना करनी चाहिये ॥ ४१-४६ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवविश्वरूपवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवविश्वरूपवर्णन' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय
भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपों तथा उनकी शक्तियों एवं पुत्रोंका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>भूयोऽपि वद मे नन्दिन् महिमानमुमापते।<br>अष्टमूर्तेर्महेशस्य शिवस्य परमेष्ठिनः ॥ १<br><br>नन्दिकेश्वर उवाच<br>वक्ष्यामि ते महेशस्य महिमानमुमापतेः।<br>अष्टमूर्तेर्जगद्व्याप्य स्थितस्य परमेष्ठिनः ॥ २<br><br>चराचराणां भूतानां धाता विश्वम्भरात्मकः।<br>शर्व इत्युच्यते देवः सर्वशास्त्रार्थपारगैः ॥ ३<br><br>विश्वम्भरात्मनस्तस्य सर्वस्य परमेष्ठिनः।<br>विकेशी कथ्यते पत्नी तनयोऽङ्गारकः स्मृतः ॥ ४ | सनत्कुमार बोले—हे नन्दिन्! उमापति परमेष्ठी अष्टमूर्ति महेश्वर शिवकी और भी महिमा मुझे बताइये ॥ १ ॥<br><br>नन्दिकेश्वर बोले—मैं जगत्को व्याप्त करके स्थित रहनेवाले परमेष्ठी उमापति महेशकी अष्टमूर्तिकी महिमा आपको बताऊँगा। चराचर प्राणियोंको धारण करनेवाले उन पृथ्वीरूप शिवको सभी शास्त्रोंके पारगामी विद्वान् शर्व—ऐसा कहते हैं ॥ २-३ ॥<br><br>उन पृथ्वीरूप परमेष्ठी शर्वकी पत्नी विकेशी कही जाती हैं और पुत्रको अंगारक (मंगल) कहा गया है ॥ ४ ॥ |