भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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६३४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| उच्यते योगशास्त्रज्ञैः समष्टिव्यष्टिकारणम्। | शिवको समष्टिव्यष्टिकारण कहते हैं॥ ८—११ १/२॥ | | क्षेत्रक्षेत्रज्ञरूपी च शिवः कैश्चिदुदाहृतः॥ १२<br>परमात्मा परं ज्योतिर्भगवान् परमेश्वरः।<br>चतुर्विंशतितत्त्वानि क्षेत्रशब्देन सूरयः॥ १३<br>प्राहुः क्षेत्रज्ञशब्देन भोक्तारं पुरुषं तथा।<br>क्षेत्रक्षेत्रविदावेते रूपे तस्य स्वयम्भुवः॥ १४<br>न किञ्चिच्च शिवादन्यदिति प्राहुर्मनीषिणः। | कुछ लोगोंने परमात्मा परमज्योतिस्वरूप परमेश्वर भगवान् शिवको क्षेत्रक्षेत्रज्ञरूपवाला बताया है। विद्वानोंने चौबीस तत्त्वोंको क्षेत्र शब्दसे तथा उनका भोग करनेवाले पुरुषको क्षेत्रज्ञ शब्दसे बोधित किया है। क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ—ये दोनों ही रूप उन्हीं स्वयं आविर्भूत शिवके हैं; शिवके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है—ऐसा मनीषियोंने कहा है॥ १२—१४ १/२॥ | | अपरब्रह्मरूपं तं परं ब्रह्मात्मकं शिवम्॥ १५<br>केचिदाहुर्महादेवमनादिनिधनं प्रभुम्।<br>भूतेन्द्रियान्तःकरणप्रधानविषयात्मकम् ॥ १६<br>अपरं ब्रह्म निर्दिष्टं परं ब्रह्म चिदात्मकम्।<br>ब्रह्मणी ते महेशस्य शिवस्यास्य स्वयम्भुवः॥ १७<br>शङ्करस्य परस्यैव शिवादन्यन्न विद्यते। | कुछ लोगोंने आदि तथा अन्तसे रहित महादेव भगवान् शिवको अपरब्रह्म (शब्दब्रह्म)-स्वरूप तथा परब्रह्मरूप भी कहा है। अपरब्रह्मको प्राणियोंके इन्द्रिय-अन्तःकरणके शब्द आदि प्रधान विषयोंके रूपवाला और परब्रह्मको चिदानन्दरूप निर्दिष्ट किया गया है। वे दोनों ही ब्रह्म इन्हीं महेश्वर परमात्मा शंकरके रूप हैं; शिवके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है॥ १५—१७ १/२॥ | | विद्याविद्यास्वरूपी च शङ्करः कैश्चिदुच्यते ॥ १८<br>धाता विधाता लोकानामादिदेवो महेश्वरः।<br>विद्येति च तमेवाहुरविद्येति मुनीश्वराः॥ १९<br>प्रपञ्चजातमखिलं ते स्वरूपे स्वयम्भुवः। | कुछ लोग लोकोंका विधान तथा पालन करनेवाले आदिदेव महेश्वर शिवको विद्या तथा अविद्याके स्वरूपवाला भी कहते हैं। मुनीश्वर लोग उन्हें विद्या कहते हैं और सम्पूर्ण जगत्प्रपंचको अविद्या कहते हैं, स्वयम्भू शिवके ही वे दोनों रूप हैं॥ १८—१९ १/२॥ | | भ्रान्तिर्विद्या परं चेति शिवरूपमनुत्तमम्॥ २०<br>अवापुर्मुनयो योगात्केचिदागमवेदिनः।<br>अर्थेषु बहुरूपेषु विज्ञानं भ्रान्तिरुच्यते॥ २१<br>आत्माकारेण संवित्तिर्बुद्धेर्विद्येति कीर्त्यते।<br>विकल्परहितं तत्त्वं परमित्यभिधीयते॥ २२<br>तृतीयं रूपमीशस्य नान्यत्किञ्चन सर्वतः। | भ्रान्ति, विद्या तथा पर—ये भी शिवके श्रेष्ठ रूप हैं, कुछ वेदवेत्ता मुनियोंने योगके द्वारा इसे प्राप्त किया है। बहुत प्रकारके अर्थोंमें विज्ञानको भ्रान्ति कहा जाता है। विद्वान् लोग सबको आत्मरूपसे जान लेनेको विद्या कहते हैं। विकल्परहित तत्त्वको 'परम' कहा जाता है। ईश्वर शिवका तीसरा अन्य कोई भी रूप नहीं है॥ २०—२२ १/२॥ | | व्यक्ताव्यक्तज्ञरूपेति शिवः कैश्चिन्निगद्यते॥ २३<br>विधाता सर्वलोकानां धाता च परमेश्वरः।<br>त्रयोविंशतितत्त्वानि व्यक्तशब्देन सूरयः॥ २४<br>वदन्त्यव्यक्तशब्देन प्रकृतिं च परां तथा।<br>कथयन्ति ज्ञशब्देन पुरुषं गुणभोगिनम्॥ २५<br>तत्त्रयं शाङ्करं रूपं नान्यत्किञ्चिदशाङ्करम्॥ २६ | कुछ लोग सभी लोकोंके रचयिता तथा पोषक परमेश्वर शिवको 'व्यक्त-अव्यक्त-ज्ञ' रूपवाला भी कहते हैं। विद्वान् लोग तेईस तत्त्वोंको 'व्यक्त' शब्दसे, परा प्रकृतिको 'अव्यक्त' शब्दसे तथा गुणोंका भोग करनेवाले पुरुषको 'ज्ञ' शब्दसे अभिहित करते हैं। इन तीनोंका समूह शंकरका ही है। शंकरसे भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है॥ २३—२६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शङ्करस्य त्रिगुणरूपवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शंकरके त्रिगुणरूपका वर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५॥