श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २२] शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन ६६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आदित्यो वै तेज ऊर्जो बलं यशो विवर्धति।<br>इत्यादिना नमस्कृत्य कल्पयेदासनं प्रभोः॥ ४०<br><br>प्रभूतं विमलं सारमाराध्यं परमं सुखम्।<br>आग्नेय्यादिषु कोणेषु मध्यमान्तं हृदा न्यसेत्॥ ४१<br><br>अङ्गं प्रविन्यसेच्चैव बीजमङ्कुरमेव च।<br>नालं सुषिरसंयुक्तं सूत्रकण्टकसंयुतम्॥ ४२<br><br>दलं दलाग्रं सुश्वेतं हेमाभं रक्तमेव च।<br>कर्णिकाकेसरोपेतं दीप्ताद्यैः शक्तिभिर्वृतम्॥ ४३<br><br>दीप्ता सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला क्रमात्।<br>अघोरा विकृता चैव दीप्ताद्याश्चाष्टशक्तयः॥ ४४<br><br>भास्कराभिमुखाः सर्वाः कृताञ्जलिपुटाः शुभाः।<br>अथवा पद्महस्ता वा सर्वाभरणभूषिताः॥ ४५<br><br>मध्यतो वरदां देवीं स्थापयेत्सर्वतोमुखीम्।<br>आवाहयेत्ततो देवीं भास्करं परमेश्वरम्॥ ४६<br><br>नवाक्षरेण मन्त्रेण बाष्कलोक्तेन भास्करम्।<br>आवाहने च सान्निध्यमनेनैव विधीयते॥ ४७<br><br>मुद्रा च पद्ममुद्राख्या भास्करस्य महात्मनः।<br>मूलेनार्घ्यं ततो दद्यात्पाद्यमाचमनं पृथक्॥ ४८<br><br>पुनरर्घ्यप्रदानेन बाष्कलेन यथाविधि।<br>रक्तपद्मानि पुष्पाणि रक्तचन्दनमेव च॥ ४९<br><br>दीपधूपादिनैवेद्यं मुखवासादिरेव च।<br>ताम्बूलवर्तिदीपाद्यं बाष्कलेन विधीयते॥ ५०<br><br>आग्नेय्यां च तथैशान्यां नैर्ऋत्यां वायुगोचरे।<br>पूर्वस्यां पश्चिमे चैव षट्प्रकारं विधीयते॥ ५१<br><br>नेत्रान्तं विधिनाभ्यर्च्य प्रणवादिन्मोऽन्तकम्।<br>कर्णिकायां प्रविन्यस्य रूपकध्यानमाचरेत्॥ ५२<br><br>सर्वे विद्युत्प्रभाः शान्ता रौद्रमस्त्रं प्रकीर्तितम्।<br>दंष्ट्राकरालवदनं हृष्टमूर्तिं भयङ्करम्॥ ५३ | भगवान् सूर्य तेज, ऊर्जा, बल और यशकी वृद्धि करते हैं (आदित्यो वै तेज ऊर्जो बलं यशो विवर्धति) इत्यादि यजुर्वेदश्रुति* से भगवान् सूर्यको नमस्कारकर उन्हें विशाल, स्वच्छ, श्रेष्ठ, प्रशस्त तथा अत्यन्त सुखदायक आसन प्रदान करना चाहिये। आग्नेय आदि चारों कोणोंमें मध्यसे अन्ततककी [महः, जनः, तपः, सत्यम्—इन चार] व्याहृतियोंका हृदयमें न्यास करना चाहिये। इसी प्रकार पूर्वोक्त अंगन्यास भी करना चाहिये। तदनन्तर बीज, अंकुर, छिद्रसहित नाल, सूत्र-कण्टकमय दल, श्वेत-स्वर्णिम तथा रक्तवर्णके दलाग्र, कर्णिका-केसरसे समन्वित तथा दीप्ता आदि शक्तियोंसे युक्त कमलकी भावना करनी चाहिये। [कमलके आठों दलोंमें] दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अघोरा, विकृता—ये सब शुभ आठ शक्तियाँ सूर्यकी ओर मुख करके दोनों हाथ जोड़कर अथवा हाथोंमें कमल धारण करके सभी आभूषणोंसे भूषित होकर क्रमसे स्थित हैं—ऐसी भावना करे और उनके मध्यमें वरदायिनी भगवती गायत्रीको स्थापित करे। तदनन्तर देवीको तथा परमेश्वर भास्करको आवाहित करना चाहिये। भगवान् भास्करको बाष्कलोक्त नवाक्षरमन्त्रसे आवाहित करना चाहिये। आवाहनके समय सन्निधापन इसी मन्त्रसे किया जाता है। महात्मा भास्करको पद्म नामक मुद्रा दिखानी चाहिये। तत्पश्चात् मूलमन्त्रके द्वारा पृथक्-पृथक् अर्घ्य, पाद्य तथा आचमन प्रदान करना चाहिये॥ ४०—४८॥<br><br>इसके बाद पुनः बाष्कलमन्त्रसे अर्घ्यस्नान प्रदान करनेके साथ विधिके अनुसार रक्तकमल, रक्तपुष्प, रक्तचन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, मुखवास (एला, लवंग आदि), ताम्बूल, आरती आदि प्रदान किये जाते हैं। तत्पश्चात् अग्निकोण, ईशानकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण, पूर्व तथा पश्चिम दिशामें छः प्रकारका यजन किया जाता है। आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमः लगाकर अंगमन्त्रोंके द्वारा नेत्रपर्यन्त उन-उन अंगोंकी पूजा करके अपने हृदयकमलमें न्यास करके उनके प्रतिबिम्बका ध्यान करना चाहिये। उनके हृदय आदि |
* यह मन्त्र कृष्ण यजुर्वेदके नारायणोपनिषदमें प्राप्त है।