श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २३] हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन ६६७
| शिवामृतेन सम्पूर्तं शिवस्य च यथातथम्।<br>अधोनिष्ठ्या वितस्त्यां तु नाभ्यामुपरि तिष्ठति॥ ५<br>हृदयं तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत्।<br>हृत्पद्मकर्णिकायां तु देवं साक्षात्सदाशिवम्॥ ६<br>पञ्चवक्त्रं दशभुजं सर्वाभरणभूषितम्।<br>प्रतिवक्त्रं त्रिनेत्रं च शशाङ्ककृतशेखरम्॥ ७<br>बद्धपद्मासनासीनं शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>ऊर्ध्वं वक्त्रं सितं ध्यायेत्पूर्वं कुङ्कुमसन्निभम्॥ ८<br>नीलाभं दक्षिणं वक्त्रमतिरक्तं तथोत्तरम्।<br>गोक्षीरधवलं दिव्यं पश्चिमं परमेष्ठिनः॥ ९<br>शूलं परशुखड्गं च वज्रं शक्तिं च दक्षिणे।<br>वामे पाशाङ्कुशं घण्टां नागं नाराचमुत्तमम्॥ १०<br>वरदाभयहस्तं वा शेषं पूर्ववदेव तु।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं चित्राम्बरधरं शिवम्॥ ११<br>ब्रह्माङ्गविग्रहं देवं सर्वदेवोत्तमोत्तमम्।<br>पूजयेत्सर्वभावेन ब्रह्माङ्गैरब्रह्मणः पतिम्॥ १२ | उत्पन्न शरीरको प्रयत्नपूर्वक शुद्ध ज्ञानसे तथा ज्ञानाग्निसे दग्ध करके कल्याणमय अमृतके द्वारा शिवके योग्य पवित्र देह बनाये। ग्रीवासे एक वितस्ति नीचे तथा नाभिसे एक वितस्ति ऊपर हृदयदेश विराजमान है, उसीको विश्वका महान् स्थान समझना चाहिये; उसी हृदयकमलकी कर्णिकामें साक्षात् भगवान् सदाशिवका ध्यान करना चाहिये। वे पाँच मुखों तथा दस भुजाओंसे युक्त हैं, सभी आभरणोंसे सुशोभित हैं, उन्होंने प्रत्येक मुखमें तीन नेत्र धारण कर रखा है, उनके मस्तकपर चन्द्रमा विराजमान है, वे बद्ध पद्मासन लगाकर बैठे हुए हैं, शुद्ध स्फटिकके समान उनका वर्ण है, उनका ऊर्ध्व मुख श्वेतवर्ण है, पूर्व मुख कुंकुमसदृश है, दक्षिण मुख नील आभावाला है और उत्तर मुख अत्यन्त रक्तवर्ण है। उन परमेष्ठी शिवका पश्चिम मुख गोदुग्धके समान धवल तथा दिव्य है। उन्होंने दाहिने हाथमें शूल, परशु, खड्ग, वज्र तथा शक्ति और बायें हाथमें पाश, अंकुश, घंटा, नाग तथा श्रेष्ठ नाराच धारण कर रखा है, वे समस्त आभरणोंसे समन्वित हैं, अद्भुत वस्त्र पहने हुए हैं और वरद तथा अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं—इस प्रकार सद्योजात आदि अंगविग्रहवाले, सभी देवताओंमें अतिश्रेष्ठ तथा ब्रह्माके पति भगवान् शिवका ध्यान करना चाहिये तथा [सद्योजातादि] ब्रह्ममन्त्रोंसे सम्यक् प्रकारसे उनका पूजन करना चाहिये॥ ४—१२॥ | | उक्तानि पञ्च ब्रह्माणि शिवाङ्गानि शृणुष्व मे।<br>शक्तिभूतानि च तथा हृदयादीनि सुव्रत॥ १३<br>ॐ ईशानः सर्वविद्यानां हृदयाय शक्तिबीजाय नमः।<br>ॐ ईश्वरः सर्वभूतानाममृताय शिरसे नमः॥ १४<br>ॐ ब्रह्माधिपतये कालाग्निरूपाय शिखायै नमः।<br>ॐ ब्रह्माणोऽधिपतये कालचण्डमारुताय कवचाय नमः॥ १५<br>ॐ ब्रह्मणे बृंहणाय ज्ञानमूर्तये नेत्राय नमः।<br>ॐ शिवाय सदाशिवाय पाशुपतास्त्राय अप्रतिहताय फट् फट्॥ १६<br>ॐ सद्योजाताय भवे भवे नातिभवे भवस्य मां भवोद्भवाय शिवमूर्तये नमः। ॐ हंसशिखाय विद्यादेहाय आत्मस्वरूपाय परापराय शिवाय शिवतमाय नमः॥ १७<br>कथितानि शिवाङ्गानि मूर्तिविद्या च तस्य वै।<br>ब्रह्माङ्गमूर्तिं विद्याङ्गसहितां शिवशासने॥ १८ | हे सुव्रत! पंचब्रह्म और शिवांग पहले ही कहे गये हैं; अब शक्तिभूत हृदय आदि मन्त्रोंको सुनिये। ॐ ईशानः सर्वविद्यानां हृदयाय शक्तिबीजाय नमः। ॐ ईश्वरः सर्वभूतानाममृताय शिरसे नमः। ॐ ब्रह्माधिपतये कालाग्निरूपाय शिखायै नमः। ॐ ब्रह्माणोऽधिपतये कालचण्डमारुताय कवचाय नमः। ॐ ब्रह्मणे बृंहणाय ज्ञानमूर्तये नेत्राय नमः। ॐ शिवाय सदाशिवाय पाशुपतास्त्राय अप्रतिहताय फट् फट्। ॐ सद्योजाताय भवे भवे नातिभवे भवस्य मां भवोद्भवाय शिवमूर्तये नमः। ॐ हंसशिखाय विद्यादेहाय आत्मस्वरूपाय परापराय शिवाय शिवतमाय नमः—ये शिवांगमन्त्र, उनके मूर्तिमन्त्र तथा विद्यामन्त्र |