भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 670, कुल 834 में से

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पृष्ठ 670

६६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग


| सौराणि च प्रवक्ष्यामि बाष्कलाद्यानि सुव्रत।<br>अङ्गानि सर्ववेदेषु सारभूतानि सुव्रत॥ १९<br>ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ<br>तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म।<br>नवाक्षरमयं मन्त्रं बाष्कलं परिकीर्तितम्।<br>न क्षरतीति लोकेऽस्मिंस्ततो ह्यक्षरमुच्यते।<br>सत्यमक्षरमित्युक्तं प्रणवादिनमोऽन्तकम्॥ २०<br>ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।<br>धियो यो नः प्रचोदयात्।<br>नमः सूर्याय खखोल्काय नमः॥ २१<br>मूलमन्त्रमिति प्रोक्तं भास्करस्य महात्मनः।<br>नवाक्षरेण दीप्ताद्या मूलमन्त्रेण भास्करम्॥ २२<br>पूजयेदङ्गमन्त्राणि कथयामि समासतः।<br>वेदादिभिः प्रभूताद्यं प्रणवेन तु मध्यमम्॥ २३<br>ॐ भूः ब्रह्मणे हृदयाय नमः। ॐ भुवः विष्णवे<br>शिरसे नमः। ॐ स्वः रुद्राय शिखायै नमः। ॐ<br>भूर्भुवः स्वः ज्वालामालिन्यै देवाय नमः। ॐ महः<br>महेश्वराय कवचाय नमः। ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यो<br>नमः। ॐ तपस्तापनाय अस्त्राय नमः।<br>एवं प्रसङ्गाद्देवेश सौराणि कथितानि ह।<br>शैवानि च समासेन न्यासयोगेन सुव्रत॥ २४<br>इत्थं मन्त्रमयं देवं पूजयेद्धृदयाम्बुजे।<br>नाभौ होमं तु कर्तव्यं जनयित्वा यथाक्रमम्॥ २५<br>मनसा सर्वकार्याणि शिवाग्नौ देवमीश्वरम्।<br>पञ्चब्रह्माङ्गसम्भूतं शिवमूर्तिं सदाशिवम्॥ २६<br>रक्तपद्मासनासीनं शकलीकृत्य यत्नतः।<br>मूलेन मूर्तिमन्त्रेण ब्रह्माङ्गाद्यैस्तु सुव्रत॥ २७<br>समिदाज्याहुतीर्हुत्वा मनसा चन्द्रमण्डलात्।<br>चन्द्रस्थानात्समुत्पन्नां पूर्णधारामनुस्मरेत्॥ २८<br>पूर्णाहुतिविधानेन ज्ञानिनां शिवशासने।<br>शिवं वक्त्रगतं ध्यायेत्तेजोमात्रं च शाङ्करम्॥ २९<br>ललाटे देवदेवेशं भ्रूमध्ये वा स्मरेत्पुनः।<br>यच्च हृत्कमले सर्वं समाप्य विधिविस्तरम्॥ ३० | कहे गये हैं। विद्यांगसहित ब्रह्मांग-मूर्तिको शिवशास्त्रमें विद्यमान जानना चाहिये। हे सुव्रत! सभी वेदोंके सारभूत सूर्यसम्बन्धी बाष्कल आदि तथा अंगमन्त्रोंको मैं [प्रसंगवश फिरसे] बताऊँगा॥ १३-१९॥<br><br>ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म—यह नौ अक्षरोंवाला बाष्कलमन्त्र कहा गया है। चूँकि नष्ट नहीं होता, अतः इस लोकमें उसे अक्षर कहा जाता है। आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमःसे युक्त मन्त्रको सत्य तथा अक्षर कहा गया है। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः—यह महात्मा भास्करका मूलमन्त्र कहा गया है। नवाक्षरमन्त्रसे दीप्ता आदि शक्तियोंकी तथा मूलमन्त्रसे भास्करकी पूजा करनी चाहिये। अब संक्षेपमें अंगमन्त्र बता रहा हूँ। अंगमन्त्र आदिमें प्रणव तथा मध्यमें व्याहृतियोंसे युक्त है। ॐ भूः ब्रह्मणे हृदयाय नमः, ॐ भुवः विष्णवे शिरसे नमः, ॐ स्वः रुद्राय शिखायै नमः, ॐ भूर्भुवः स्वः ज्वालामालिन्यै देवाय नमः, ॐ महः महेश्वराय कवचाय नमः, ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यो नमः, ॐ तपस्तापनाय अस्त्राय नमः। हे सुव्रत! इस प्रकार मैंने यहाँ प्रसंगवश संक्षेपमें न्यासयोगसे सौर तथा शैव मन्त्रोंको कह दिया॥ २०-२४॥<br><br>इस प्रकार हृदयकमलमें मन्त्रमय भगवान् शिवकी पूजा करे तथा नाभिस्थानमें यथाविधि अग्नि उत्पन्न करके होम करे; सभी कार्य मनसे ही सम्पन्न करना चाहिये। रक्तकमलके आसनपर बैठे हुए पंचब्रह्मांगसम्भूत कल्याणमूर्ति भगवान् सदाशिवको सकलीकृत करके यत्नपूर्वक मूलमन्त्र, मूर्तिमन्त्र, ब्रह्ममन्त्र और अंगमन्त्रोंसे शिवाग्निमें मनसे ही समिधा और घृतकी आहुति प्रदान करके ज्ञानियोंके लिये शिवशास्त्रमें कही गयी तथा चन्द्रमण्डलमें चन्द्रस्थानसे उत्पन्न अमृतधाराका पूर्णाहृतिके विधानसे स्मरण करना चाहिये। कल्याणकारी तेजोमय शिव मेरे मुखमें प्रविष्ट हैं—ऐसा ध्यान करना चाहिये। ललाटमें अथवा भ्रूमध्यस्थानमें उन देवदेवेश शिवका |

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