श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ६७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्त्वशुद्धिः षष्ठेन सद्येन तृतीयेन फडन्ताद्धराशुद्धिः ॥ ६<br><br>षष्ठसहितेन सद्येन तृतीयेन फडन्तेन वारितत्त्वशुद्धिः ॥ ७<br><br>वाह्नेयतृतीयेन फडन्तेनाग्निशुद्धिः ॥ ८<br><br>वायव्यचतुर्थेन षष्ठसहितेन फडन्तेन वायुशुद्धिः ॥ ९<br><br>षष्ठेन ससद्येन तृतीयेन फडन्तेनाकाशशुद्धिः ॥ १० | तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये ॥ ४-५ ॥<br><br>तत्त्वशुद्धि इस प्रकार होती है—अन्तमें फट्से युक्त छठे 'नमो हिरण्यबाहवे०' मन्त्र, सद्योजातमन्त्र तथा तृतीय अघोरमन्त्रसे पृथ्वीतत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त षष्ठ मन्त्रसहित सद्योजात और तृतीय अघोरमन्त्रसे जलतत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त अग्निसम्बन्धी तृतीय अघोरमन्त्रसे अग्नितत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त षष्ठ मन्त्रसहित वायुसम्बन्धी चतुर्थ तत्पुरुषमन्त्रसे वायुतत्त्वकी शुद्धि होती है और फडन्त सद्योजातसहित षष्ठ तथा तृतीय अघोर-मन्त्रसे आकाशतत्त्वकी शुद्धि होती है ॥ ६—१०॥ |
| उपसंहृत्यैवं सद्यषष्ठेन तृतीयेन मूलेन फडन्तेन ताडनं<br>तृतीयेन सम्पुटीकृत्य ग्रहणं मूलमेव योनिबीजेन<br>सम्पुटीकृत्वा बन्धनं बन्धः ॥ ११ | इस प्रकार पूर्वोक्तका उपसंहार करके सद्योजातमन्त्रके साथ षष्ठ 'नमो हिरण्यबाहवे०' और तृतीय 'अघोरेभ्यो०' मन्त्रके साथ फडन्त मूलमन्त्र [पंचाक्षरी]-से ताड़न करे। तृतीय [अघोरेभ्यो०] मन्त्रसे सम्पुटित मूल [पंचाक्षरी] मन्त्रद्वारा ग्रहण करे। योनि [ह्रीं] बीजद्वारा सम्पुटितकर मूल [पंचाक्षरी]-से दिग्बन्ध करे ॥ ११ ॥ |
| एवं शान्तातीतादिनिवृत्तिपर्यन्तं पूर्ववत्कृत्वा प्रणवेन<br>तत्त्वत्रयकमनुध्याय आत्मानं दीपशिखाकारं<br>पुर्यष्टकसहितं त्रयातीतं शक्तिक्षोभेणामृतधारां<br>सुषुम्णायां ध्यात्वा ॥ १२ | इक्कीसवें अध्यायमें कहे गये शांतातीतादिसे निवृत्तिकलातक सब विधान पूर्ण करके प्रणवद्वारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्ररूप दीपशिखाकार आत्माका ध्यान करके शुद्ध चैतन्यरूपको मूलाधारादि पुर्यष्टकके साथ त्रयातीत [विश्व तैजस, प्राज्ञादिसे परे] स्वयं का कुण्डलिनीप्रबोध होनेसे सुषुम्णामें अमृतधारारूपमें ध्यान करे। इसी प्रकार नाद, बिन्दु, अकार, उकार तथा मकारका जिनमें अन्त होता है और जो रुद्र, विष्णु तथा ब्रह्मासे भी अतीत हैं, उन कल्याणकारी सदाशिवका शान्त्यातीता आदिसे |
| शान्त्यतीतादिनिवृत्तिपर्यन्तानां चान्तर्नादबिन्द्वकारो-<br>कारमकारान्तं शिवं सदाशिवं रुद्रविष्णुब्रह्मान्तं<br>सृष्टिक्रमेणामृतीकरणं ब्रह्मन्यासं कृत्वा पञ्चवक्त्रेषु<br>पञ्चदशनयनं विन्यस्य मूलेन पादादिकेशान्तं<br>महामुद्रामपि बद्ध्वा शिवोऽहमिति ध्यात्वा<br>शक्त्यादीनि विन्यस्य हृदि शक्त्या बीजाङ्कुरा-<br>नन्तरात्तसुषिरसूत्रकण्टकपत्रकेसरधर्मज्ञानवैराग्यै-<br>श्वर्यसूर्यसोमाग्निवामा-ज्येष्ठा-रौद्रीकाली-कल- | निवृत्तिपर्यन्त [पाँच] कलाओंका ध्यान करके सृष्टिक्रमसे अमृतीकरण तथा ब्रह्मन्यासकर उनके पाँच मुखोंमें पन्द्रह नेत्रोंका न्यास करे और मूल मन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-के द्वारा पादसे केशपर्यन्त न्यास करके महामुद्रा बाँधकर 'मैं शिव हूँ'—ऐसा ध्यान करे, पुनः शक्ति आदिका न्यास करके हृदयाकाशमें शक्तिके साथ बीज, अंकुर, व्यवधानरहित छिद्र, सूत्र, कण्टक, पत्र, केसर और कर्णिकायुक्त कमलका ध्यान करके उसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, सूर्य, चन्द्र, अग्निका तथा उसके |