श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग | | :--- | :--- |
| धेनुमुद्रां च दर्शयित्वा कवचेनावगुण्ठ्यास्त्रेण रक्षां च विधाय द्रव्यशुद्धिं कुर्यात् ॥ १८ | आदि अर्पण करके उन्हें धेनुमुद्रा दिखाकर कवचसे अवगुण्ठन और अस्त्र-मन्त्रसे रक्षाविधान करके द्रव्यशुद्धि करनी चाहिये ॥ १५-१८ ॥ | | अर्घ्योदकमग्रे हृदा गन्धमादायास्त्रेण विशोध्यं पूजाप्रभृतिकरणं रक्षान्तं कृत्वैवं द्रव्यशुद्धिं पूजासमर्पणान्तं मौनमास्थाय पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा सर्वमन्त्राणि प्रणवादिन्मोऽन्ताज्जपित्वा पुष्पाञ्जलिं त्यजेन्मन्त्रशुद्धिरित्थम् ॥ १९ | सर्वप्रथम हृदयमन्त्रके द्वारा अर्घ्योदकयुक्त गन्ध लेकर अस्त्रमन्त्रसे शोधन करके पूजनोपयोगी साधन सम्प्रोक्षणसे लेकर [भूतापसारण, दिग्बन्धनादि] रक्षाविधान करके ही द्रव्यशुद्धि करे; तब पूजासमर्पणके अन्ततक मौन धारण करके अन्तमें पुष्पांजलि ग्रहण करके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमःसे युक्त सभी पूजा-मन्त्रोंको जपकर पुष्पांजलि छोड़ देनी चाहिये—इस प्रकार मन्त्रशुद्धि होती है॥ १९॥ | | अग्रे सामान्यार्घ्यपात्रं पयसापूर्य गन्धपुष्पादिना संहितायामभिमन्त्र्य धेनुमुद्रां दत्त्वा कवचेनावगुण्ठ्यास्त्रेण रक्षयेत्। पूजां पर्युषितां गायत्र्या समभ्यर्च्य सामान्यार्घ्यं दत्त्वा गन्धपुष्पधूपाचमनीयं स्वधान्तं नमोऽन्तं वा दत्त्वा ब्रह्माभिः पृथक्पृथक्पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा फडन्तास्त्रेण निर्माल्यं व्यपोह्य ईशान्यां चण्डमभ्यर्च्य्यासनमूर्तिं चण्डं सामान्यास्त्रेण लिङ्गपीठं शिवं पाशुपतास्त्रेण विशोध्य मूर्ध्नि पुष्पं निधाय पूजयेल्लिङ्गशुद्धिः ॥ २० | अपने आगे सामान्य अर्घ्यपात्रको जलसे पूर्ण करके उसमें गन्ध-पुष्प आदि डालकर संहितामन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित करे और धेनुमुद्रा दिखाकर कवचसे अवगुण्ठन करके अस्त्रमन्त्रसे रक्षा करे। पूर्व दिनके पूजित शिवलिङ्गकी गायत्रीसे अर्चना करके सामान्य अर्घ्य प्रदानकर स्वधा अथवा नमः अन्तमें लगाकर गन्ध, पुष्प, धूप, आचमनीय आदि उपचार अर्पित करके ब्रह्ममन्त्रोंसे पृथक्-पृथक् पुष्पांजलि प्रदान करे; इसके बाद फडन्त अस्त्रमन्त्रसे निर्माल्य उतारकर ईशान दिशामें चण्डका अभ्यर्चन करके आसनमूर्ति चण्डका सामान्य अस्त्रमन्त्रसे और लिङ्गपीठ (योनि) तथा शिवलिङ्गका पाशुपतास्त्रमन्त्रसे विशोधन करके लिङ्गके मस्तकपर पुष्प रखकर पूजन करे; इस प्रकार लिङ्गशुद्धि होती है॥ २०॥ | | आसनं कूर्मशिलायां बीजाङ्कुरं तदुपरि ब्रह्मशिलायामन्तन्नालसुषिरे सूत्रपत्रकण्टककर्णिकाकेसरधर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यसूर्यासोमाग्निकेसरशक्तिं मनोन्मनीं कर्णिकायां मनोन्मनेनानन्तासनायेति समासेनासनं परिकल्प्य तदुपरि निवृत्त्यादिकलामयं षड्विधसहितं कर्मकलाङ्गदेहं सदाशिवं भावयेत् ॥ २१ | तत्पश्चात् कूर्मपृष्ठके आसन और उसके ऊपर बीजांकुर, पुनः उसके ऊपर ब्रह्मशिलापर छिद्रयुक्त अनन्त नालके भीतर सूत्र, दल, कण्टक, कर्णिका, केसर, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वामा आदि [पूर्वकथित आठ] शक्तियाँ और कर्णिकामें मनोन्मनसहित मनोन्मनीका ध्यान करे। पुनः ‘अनन्तासनाय नमः’—इस मन्त्रसे संक्षेपमें आसन कल्पित करके उसके ऊपर निवृत्ति आदि कलायुक्त षट्कोशसहित वेदमूर्ति सदाशिवका चिन्तन करे॥ २१॥ | | उभाभ्यां सपुष्पाभ्यां हस्ताभ्यामङ्गुष्ठेन पुष्पमापीड्य | तदनन्तर दोनों हाथोंमें पुष्प ग्रहणकर अँगुष्ठसे |