भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 86

८४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

नमः केयूरभूषाय गोपते ते नमो नमः।<br>नमः श्रीकण्ठनाथाय नमो लिकुचपाणये॥ ३६किये जानेयोग्य आपको नमस्कार है। पालाशाकृन्त एवं पालाधिपतिको नमस्कार है॥ ३५॥<br>आभूषणके रूपमें सर्पका बाजूबन्द धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है। हे गोपते! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। श्रीकंठनाथको नमस्कार है। श्रीदण्डपाणिको नमस्कार है॥ ३६॥
भुवनेशाय देवाय वेदशास्त्र नमोऽस्तु ते।<br>सारङ्गाय नमस्तुभ्यं राजहंसाय ते नमः॥ ३७हे वेदशास्त्रस्वरूप! आप भुवनेशदेवको नमस्कार है। आप सारंग तथा राजहंसको नमस्कार है॥ ३७॥
कनकाङ्गदहाराय नमः सर्पोपवीतिने।<br>सर्पकुण्डलमालाय कटिसूत्रीकृताहिने॥ ३८धतूरेका बाजूबन्द तथा हार धारण करनेवाले एवं सर्पका जनेऊ धारण करनेवाले, सर्पोंका कुण्डल तथा माला पहननेवाले, सर्पका कटिसूत्र (करधनी) धारण करनेवाले, वेदगर्भ, गर्भरूप तथा विश्वगर्भ हे शिव! आपको नमस्कार है॥ ३८^{१}/_२॥
वेदगर्भाय गर्भाय विश्वगर्भाय ते शिव।
ब्रह्मोवाच<br>विरामेति संस्तुत्वा ब्रह्मणा सहितो हरिः॥ ३९ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार [मुझ] ब्रह्माके साथ विष्णुभगवान् स्तुति करके शान्त हो गये। पुण्य प्रदान करनेवाले तथा सभी पापोंका नाश करनेवाले इस उत्तम स्तोत्रका जो प्राणी पाठ करता है अथवा इसे वेदके पारगामी ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह पापकर्ममें लिप्त रहनेपर भी ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। अतएव सभी पापोंकी शुद्धिहेतु मनुष्यको विष्णुद्वारा कहे गये इस स्तोत्रका नित्य जप करना चाहिये, पाठ करना चाहिये तथा इसे धर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंको सुनाना चाहिये॥ ३९—४२॥
एतत्स्तोत्रवरं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>यः पठेच्छ्रावयेद्वापि ब्राह्मणान् वेदपारगान्॥ ४०
स याति ब्रह्मणो लोके पापकर्मरतोऽपि वै।<br>तस्माज्जपेतद्वेनित्यं श्रावयेद् ब्राह्मणाञ्छुभान्॥ ४१
सर्वपापविशुद्ध्यर्थं विष्णुना परिभाषितम्॥ ४२

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विष्णुस्तवो नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विष्णुस्तव' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८॥


उन्नीसवाँ अध्याय

महादेवजीद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुको वर प्रदान करना तथा उमामहेश्वर-पूजनके रूपमें लिङ्गपूजनकी परम्पराका प्रारम्भ

सूत उवाच<br>अथोवाच महादेवः प्रीतोऽहं सुरसत्तमौ।<br>पश्यतां मां महादेवं भयं सर्वं विमुच्यताम्॥ १सूतजी बोले—तदनन्तर महादेवजीने कहा—हे श्रेष्ठ देवद्वय (ब्रह्मा, विष्णु)! मैं आप दोनोंपर प्रसन्न हूँ। मुझ महादेवका दर्शन करो और सभी प्रकारके भयका त्याग कर दो॥ १॥
युवां प्रसूतौ गात्राभ्यां मम पूर्वं महाबलौ।<br>अयं मे दक्षिणे पार्श्वे ब्रह्मा लोकपितामहः॥ २आप दोनों महाबली देवता पूर्वकालमें मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए थे। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ये ब्रह्मा मेरे दक्षिण (दायें) अंगसे तथा विश्वात्मा और हृदयोद्भव
श्रीलिंगमहापुराण · पृष्ठ 86, कुल 834 में से · BharatKosha