भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87

अध्याय १९] महादेवजीद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुको वरप्रदान तथा लिङ्गपूजनकी परम्पराका प्रारम्भ ८५


| वामे पार्श्वे च मे विष्णुर्विश्वात्मा हृदयोद्भवः।<br>प्रीतोऽहं युवयोः सम्यग्वरं दद्मि यथेप्सितम्॥ ३ | ये विष्णु मेरे बायें अंगसे उत्पन्न हुए हैं। मैं आप दोनोंपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। अतएव यथेच्छ वर माँगो; मैं उसे अभी दूँगा॥ २-३॥ | | एवमुक्त्वा तु तं विष्णुं कराभ्यां परमेश्वरः।<br>पस्पर्श सुभागाभ्यां तु कृपया तु कृपानिधिः॥ ४ | इतना कहकर कृपानिधि परमेश्वर महादेवने अपने दोनों सुन्दर हाथोंसे प्रीतिपूर्वक उन विष्णुका स्पर्श किया॥ ४॥ | | ततः प्रहृष्टमनसा प्रणिपत्य महेश्वरम्।<br>प्राह नारायणो नाथं लिङ्गस्थं लिङ्गवर्जितम्॥ ५ | तब लिङ्गमें विराजित तथा लिङ्गदेहशून्य स्वेच्छासे विग्रह धारण करनेवाले महेश्वरको प्रणाम करके प्रसन्न मनसे नारायण विष्णुने कहा॥ ५॥ | | यदि प्रीतिः समुत्पन्ना यदि देयो वरश्च नौ।<br>भक्तिर्भवतु नौ नित्यं त्वयि चाव्यभिचारिणी॥ ६ | यदि आपके हृदयमें हमारे प्रति प्रीति-भाव उत्पन्न हुआ है और यदि हमें वरदान देना चाहते हैं, तो यही वर दीजिये कि आपके प्रति हम दोनोंकी सदा दृढ़ भक्ति बनी रहे॥ ६॥ | | देवः प्रदत्तवान् देवाः स्वात्मन्यव्यभिचारिणीम्।<br>ब्रह्मणे विष्णवे चैव श्रद्धां शीतांशुभूषणः॥ ७ | हे देवताओ! चन्द्रमाको आभूषणस्वरूप धारण करनेवाले महादेवने ब्रह्मा तथा विष्णुको अपनी अचल श्रद्धा-भक्ति प्रदान की॥ ७॥ | | जानुभ्यामवनीं गत्वा पुनर्नारायणः स्वयम्।<br>प्रणिपत्य च विश्वेशं प्राह मन्दतरं वशी॥ ८ | पुनः जमीनपर घुटना टेककर प्रणाम करते हुए इन्द्रियजित् नारायण विष्णुने साक्षात् विश्वेश्वर महादेवसे अत्यन्त मधुरतासे कहा॥ ८॥ | | आवयोर्देवदेवेश विवादमतिशोभनम्।<br>इहागतो भवान् यस्माद्विवादशमनाय नौ॥ ९ | हे देवदेवेश! हम दोनोंका यह विवाद तो अत्यन्त मङ्गलकारी सिद्ध हुआ; क्योंकि हम दोनोंके इसी विवादको समाप्त करनेके निमित्त आप यहाँ प्रकट हुए हैं॥ ९॥ | | तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह हरो हरिम्।<br>प्रणिपत्य स्थितं मूर्ध्ना कृताञ्जलिपुटं स्मयन्॥ १० | उनका यह वचन सुनकर भगवान् शम्भुने दोनों हाथ जोड़े तथा सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए वहाँ स्थित विष्णुसे मुसकराकर पुनः कहा॥ १०॥ | | श्रीमहादेव उवाच<br>प्रलयस्थितिसर्गाणां कर्ता त्वं धरणीपते।<br>वत्स वत्स हरे विष्णो पालयैतच्चराचरम्॥ ११ | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पृथ्वीपते! उत्पत्ति, स्थिति तथा संहारके कर्ता आप हैं। हे वत्स! हे वत्स! हे हरे! हे विष्णो! आप इस चराचर जगत्‌का पालन कीजिये॥ ११॥ | | त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुभवाख्यया।<br>सर्गर्क्षालयगुणैर्निष्कलः परमेश्वरः॥ १२ | हे विष्णो! मैं निष्कल परमेश्वर ही ब्रह्मा, विष्णु तथा भव (रुद्र) नामोंसे अलग-अलग तीन प्रकारके रूपोंमें सृजन, पालन तथा संहारके गुणोंसे युक्त हूँ॥ १२॥ | | सम्मोहं त्यज भो विष्णो पालयैनं पितामहम्।<br>पाद्मे भविष्यति सुतः कल्पे तव पितामहः॥ १३ | हे विष्णो! आप मोहका त्याग करें और इन पितामहका पालन करें। ये पितामह पाद्म कल्पमें आपके पुत्र होंगे। | | तदा द्रक्ष्यसि मां चैवं सोऽपि द्रक्ष्यति पद्मजः।<br>एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १४ | उस समय आप तथा आपके पुत्ररूप वे कमलोद्भव ब्रह्मा—दोनों लोग मेरा दर्शन प्राप्त करेंगे। |