श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद १३
केशवचन्द्र सेन के साथ श्रीरामकृष्ण का नौका विहार, आनन्द और वार्तालाप
(१)
समाधि में
आज शरत्-पूर्णिमा है। लक्ष्मीजी की पूजा है। शुक्रवार, २७ अक्टूबर १८८२। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर के उसी पूर्व-परिचित कमरे में बैठे हैं। विजय गोस्वामी और हरलाल से बातचीत कर रहे हैं। एक आदमी ने आकर कहा, 'केशव सेन जहाज पर चढ़कर घाट पर आए हैं।' केशव के शिष्यों ने प्रणाम करके कहा, 'महाराज, जहाज आया है। आपको चलना होगा; चलिए, जरा घूम आइएगा। केशवबाबू जहाज में हैं, हमें भेजा है।'
शाम के चार बज गए हैं। श्रीरामकृष्ण नाव पर होते हुए जहाज पर चढ़ रहे हैं। साथ विजय हैं। नाव पर चढ़ते ही बाह्यज्ञानरहित समाधिमग्न हो गए।
मास्टर जहाज में खड़े खड़े यह समाधिचित्र देख रहे हैं। वे दिन के तीन बजे केशव के साथ जहाज पर चढ़कर कलकत्ते से आए हैं। बड़ी इच्छा है, श्रीरामकृष्ण और केशव का मिलन, उनका आनन्द देखेंगे और उनकी बातें सुनेंगे। केशव ने अपने साधुचरित्र और वक्तृता के बल से मास्टर जैसे अनेक वंगीय युवकों का मन हर लिया है। अनेकों ने उन्हें अपना परम आत्मीय जानकर अपने हृदय का प्रेम समर्पित कर दिया है। केशव अंग्रेजी जानते हैं, अंग्रेजी दर्शन और साहित्य जानते हैं, फिर बहुत बार देव-देवियों की पूजा को पौत्तलिकता भी कहते हैं। इस प्रकार के मनुष्य श्रीरामकृष्ण को भक्ति और श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। और बीच बीच में दर्शन करने आते हैं, यह बात अवश्य विस्मयजनक है। उनके मन में मेल कहाँ और किस प्रकार हुआ, यह रहस्य-भेद करने के लिए मास्टर आदि अनेकों को कौतूहल हुआ है। श्रीरामकृष्ण निराकारवादी तो हैं, किन्तु साकारवादी भी हैं। ब्रह्म का चिन्तन करते हैं, और फिर देव-देवियों के सामने पुष्प-चन्दन से पूजा और प्रेम से मतवाले होकर नृत्यगीत भी करते हैं। खाट और बिछौने पर बैठते हैं, लाल धारीदार