श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २४ अक्टूबर, १८८२ |
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गुलाम है। - ईश्वर-दर्शन क्यों नहीं होते? क्योंकि बीच में कामिनी कांचन की आड़ जो है।
पूर्व कथा - बर्दवान के मार्ग में - देश यात्रा - नकुड़ आचार्य का गाना सुनना।
“अच्छा, कहो तो मेरी क्या अवस्था है? उस देश को जा रहा था, बर्दवान से उतरकर; बैलगाड़ी पर बैठा था - ऐसे समय जोर की आँधी चली और पानी बरसने लगा। इधर न जाने कहाँ से गाड़ी के पीछे कुछ आदमी आ गए। मेरे साथी कहने लगे, ये डाकू हैं। तब मैं ईश्वर का नाम जपने लगा, परन्तु कभी तो राम राम जपता और कभी काली काली, कभी हनुमान हनुमान, - सब तरह से जपने लगा; कहो तो यह क्या है?”
श्रीरामकृष्ण क्या ऐसा कह रहे हैं कि ईश्वर एक है और उसके नाम असंख्य, भिन्न धर्मावलंबी वा सम्प्रदायों के लोग क्या ऐसेही मिथ्या झगड़ा करके मर रहे हैं?
(बलराम से) - “कामिनी-कांचन ही माया है। इसके भीतर अधिक दिन तक रहने से होश चला जाता है, - ऐसा जान पड़ता है कि खूब मजे में हैं। मेहतर विष्ठा का भार ढोता है; ढोते ढोते फिर घृणा नहीं होती। भगवन्नामगुण-कीर्तन का अभ्यास करने ही से भक्ति होती है। (मास्टर से) इसमें लजाना नहीं चाहिए। लज्जा, घृणा और भय इन तीनों के रहते ईश्वर नहीं मिलता।
“उस देश में बड़ा अच्छा कीर्तन करते हैं, - खोल (मृदंग) लेकर कीर्तन करते हैं। नकुड़ आचार्य का गाना बड़ा अच्छा है। वृन्दावन में तुम्हारी ओर से सेवा होती है?”
बलराम - जी हाँ, एक कुंज है - श्यामसुन्दर की सेवा होती है।
श्रीरामकृष्ण - मैं वृन्दावन गया था। निधुवन बड़ा सुन्दर स्थान है।
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