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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद १२

दक्षिणेश्वर मन्दिर में बलराम आदि के साथ –

बलराम को शिक्षा

आज मंगलवार है, दिन का पिछला पहर, २४ अक्टूबर। तीन-चार बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण मिठाई के ताक के पास खड़े हैं। बलराम और मास्टर कलकत्ते से एक ही गाड़ी पर चढ़कर आए हैं और प्रणाम कर रहे हैं। प्रणाम करके बैठने पर श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कहने लगे, “ताक पर से कुछ मिठाई लेने गया था, मिठाई पर हाथ रखा ही था कि एक छिपकली बोल उठी, तुरन्त हाथ हटा लिया!” (सब हँसे।)

लक्षण। सत्यभाषण। कामिनी-कांचन ही माया है।

श्रीरामकृष्ण – यह सब मानना चाहिए। देखो न, राखाल बीमार पड़ गया; मेरे भी हाथ-पैर में दर्द हो रहा है। क्या हुआ, सुनो। सुबह को मैंने उठते ही राखाल आ रहा है सोचकर अमुक का मुख देख लिया था। (सब हँसते हैं।) हाँ जी, लक्षण भी देखना चाहिए। उस दिन नरेन्द्र एक काने लड़के को लाया था, – उसका मित्र है; आँख बिलकुल कानी नहीं थी; जो हो, मैंने सोचा, – नरेन्द्र यह आफत का पुतला कहाँ से लाया!

“और एक आदमी आता है; मैं उसके हाथ की कोई चीज नहीं खा सकता। वह आफिस में काम करता है, बीस रुपया महीना पाता है और बीस रुपया न जाने कैसा झूठा बिल लिखकर पाता है। वह झूठ बोलता है, इसलिए आने पर उससे बहुत नहीं बोलता। कभी तो दो-दो चार-चार ;दिन आफिस जाता ही नहीं, यहीं पड़ा रहता है। किस मतलब से, जानते हो? – मतलब यह कि किसी से कह-सुन दूँ तो दूसरी जगह नौकरी हो जाय।”

बलराम का वंश परम वैष्णवों का वंश है। बलराम के पिता वृद्ध हो गए हैं, – परम वैष्णव हैं। सिर पर शिखा है, गले में तुलसी की माला है, हाथ में सदा ही माला लिए जप करते रहते हैं। उड़ीसा में इनकी बहुत बड़ी जमींदारी है और कोठार, श्रीवृन्दावन तथा और भी कई जगह श्रीराधाकृष्ण-विग्रह की सेवा होती है और धर्मशाला भी है। बलराम अभी पहले-पहल आने लगे हैं। श्रीरामकृष्ण बातों बातों में उन्हें उपदेश दे रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – उस दिन अमुक आया था। सुना है, उस कालीकलूटी स्त्री का

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar