श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ अक्टूबर, १८८२
होगा।
“वृन्दावन का भाव बड़ा सुन्दर है। नये यात्री जाते हैं तो ब्रज के लड़के कहा करते हैं, 'हरि बोलो, गठरी खोलो'।”
दिन के ग्यारह बजे बाद श्रीरामकृष्ण ने काली का प्रसाद पाया। दोपहर को कुछ आराम करके धूप ढलने पर फिर भक्तों के साथ वार्तालाप करने लगे। बीच बीच में रह-रहकर प्रणव-नाद या 'हा चैतन्य' उच्चारण कर रहे हैं।
कालीमन्दिर में सन्ध्यारती होने लगी। आज विजया दशमी है, श्रीरामकृष्ण कालीघर में आए हैं। कालीमाता को प्रणाम करके भक्तजन श्रीरामकृष्ण की पदधूलि ग्रहण करने लगे। रामलाल ने कालीजी की आरती की है। श्रीरामकृष्ण रामलाल को बुलाने लगे – “कहाँ हो रामलाल!”
कालीजी को 'विजया' निवेदित की गयी है। श्रीरामकृष्ण उस प्रसाद को छूकर उसे देने के लिए ही रामलाल को बुला रहे हैं। अन्य भक्तों को भी कुछ कुछ देने को कह रहे हैं।