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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

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८६श्रीरामकृष्णवचनामृत२७ अक्तूबर, १८८२

इसीलिए कहते हैं - लाखों में से दो ही एक कटते हैं और तब तू हँसकर तालियाँ पीटती है। (सब प्रसन्न होते हैं।)

"उन्होंने मन को आँखों के इशारे कह दिया है - 'जा, संसार में विचर।' मन का क्या कसूर है? वे यदि फिर कृपा करके मन को फेर दें तो विषय-बुद्धि से छुटकारा मिले; तब फिर उनके पादपद्मों में मन लगे।"

श्रीरामकृष्ण संसारियों के भाव में माँ के प्रति अभिमान करके गाने लगे -

(भावार्थ) - "'मैं यह खेद करता हूँ कि तुम जैसी माँ के रहते, मेरे जागते हुए भी, घर में चोरी हो! मन में होता है कि तुम्हारा नाम लूँ, परन्तु समय टल जाता है। मैंने समझा है, जाना है और मुझे आशय भी मिला है कि यह सब तुम्हारी ही चातुरी है। तुमने न कुछ दिया, न पाया; न लिया, न खाया; यह क्या मेरा ही कसूर है? यदि देतीं तो पातीं, लेतीं और खातीं, मैं भी तुम्हारा ही तुम्हें देता और खिलाता। यश अपयश, सुरस कुरस, सभी रस तुम्हारे हैं। रसेश्वरी! रस में रहकर यह रसभंग क्यों? 'प्रसाद' कहता है - तुम्हीं ने मन को पैदा करते समय इशारा कर दिया है। तुम्हारी यह सृष्टि किसी की कुदृष्टि से जल गयी है, पर हम उसे मीठी समझकर भटक रहे हैं।'

"उन्हीं की माया से भूलकर मनुष्य संसारी हुआ है। 'प्रसाद' कहता है, तुम्हीं ने मन को पैदा करते समय इशारा कर दिया है।"

कर्मयोग। संसार तथा निष्काम कर्म

ब्राह्मभक्त - महाराज, बिना सब त्याग किए क्या ईश्वर नहीं मिलते?

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - नहीं जी, तुम लोगों को सब कुछ क्यों त्याग करना होगा? तुम लोग तो बड़े अच्छे हो, इधर भी हो और उधर भी, आधा खाँड़ और आधा शिरा! (लोग हँसते हैं।) बड़े आनन्द में हो। नक्स का खेल जानते हो? मैं ज्यादा काटकर जल गया हूँ। तुम लोग बड़े सयाने हो, कोई दस में हो, कोई छः में, कोई पाँच में। तुमने ज्यादा नहीं काटा इसलिए मेरी तरह जल नहीं गए। खेल चल रहा है। यह तो अच्छा है। (सब हँसे।)

"सच कहता हूँ, तुम लोग गृहस्थी में हो, इसमें कोई दोष नहीं। पर मन ईश्वर की ओर रखना चाहिए। नहीं तो न होगा। एक हाथ से काम करो और एक हाथ से ईश्वर को पकड़े रहो। काम खतम हो जाने पर दोनों हाथों से ईश्वर को पकड़ लेना।"

"सब कुछ मन पर निर्भर है। मन ही से बद्ध है और मन ही से मुक्त। मन पर जो रंग चढ़ाओगे उसी से वह रंग जायगा। जैसे रँगरेज के घर के कपड़े, लाल रंग से रँगो तो लाल; हरे से रँगो तो हरे; सब्ज से रँगो, सब्ज; जिस रंग से रँगो वही रंग चढ़ जायगा। देखो न, अगर कुछ अंग्रेजी पढ़ लो तो मुँह में अंग्रेजी शब्द आ जाते हैं - फुट-फट् इट्-मिट्।