श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
| ८६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २७ अक्तूबर, १८८२ |
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इसीलिए कहते हैं - लाखों में से दो ही एक कटते हैं और तब तू हँसकर तालियाँ पीटती है। (सब प्रसन्न होते हैं।)
"उन्होंने मन को आँखों के इशारे कह दिया है - 'जा, संसार में विचर।' मन का क्या कसूर है? वे यदि फिर कृपा करके मन को फेर दें तो विषय-बुद्धि से छुटकारा मिले; तब फिर उनके पादपद्मों में मन लगे।"
श्रीरामकृष्ण संसारियों के भाव में माँ के प्रति अभिमान करके गाने लगे -
(भावार्थ) - "'मैं यह खेद करता हूँ कि तुम जैसी माँ के रहते, मेरे जागते हुए भी, घर में चोरी हो! मन में होता है कि तुम्हारा नाम लूँ, परन्तु समय टल जाता है। मैंने समझा है, जाना है और मुझे आशय भी मिला है कि यह सब तुम्हारी ही चातुरी है। तुमने न कुछ दिया, न पाया; न लिया, न खाया; यह क्या मेरा ही कसूर है? यदि देतीं तो पातीं, लेतीं और खातीं, मैं भी तुम्हारा ही तुम्हें देता और खिलाता। यश अपयश, सुरस कुरस, सभी रस तुम्हारे हैं। रसेश्वरी! रस में रहकर यह रसभंग क्यों? 'प्रसाद' कहता है - तुम्हीं ने मन को पैदा करते समय इशारा कर दिया है। तुम्हारी यह सृष्टि किसी की कुदृष्टि से जल गयी है, पर हम उसे मीठी समझकर भटक रहे हैं।'
"उन्हीं की माया से भूलकर मनुष्य संसारी हुआ है। 'प्रसाद' कहता है, तुम्हीं ने मन को पैदा करते समय इशारा कर दिया है।"
कर्मयोग। संसार तथा निष्काम कर्म
ब्राह्मभक्त - महाराज, बिना सब त्याग किए क्या ईश्वर नहीं मिलते?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - नहीं जी, तुम लोगों को सब कुछ क्यों त्याग करना होगा? तुम लोग तो बड़े अच्छे हो, इधर भी हो और उधर भी, आधा खाँड़ और आधा शिरा! (लोग हँसते हैं।) बड़े आनन्द में हो। नक्स का खेल जानते हो? मैं ज्यादा काटकर जल गया हूँ। तुम लोग बड़े सयाने हो, कोई दस में हो, कोई छः में, कोई पाँच में। तुमने ज्यादा नहीं काटा इसलिए मेरी तरह जल नहीं गए। खेल चल रहा है। यह तो अच्छा है। (सब हँसे।)
"सच कहता हूँ, तुम लोग गृहस्थी में हो, इसमें कोई दोष नहीं। पर मन ईश्वर की ओर रखना चाहिए। नहीं तो न होगा। एक हाथ से काम करो और एक हाथ से ईश्वर को पकड़े रहो। काम खतम हो जाने पर दोनों हाथों से ईश्वर को पकड़ लेना।"
"सब कुछ मन पर निर्भर है। मन ही से बद्ध है और मन ही से मुक्त। मन पर जो रंग चढ़ाओगे उसी से वह रंग जायगा। जैसे रँगरेज के घर के कपड़े, लाल रंग से रँगो तो लाल; हरे से रँगो तो हरे; सब्ज से रँगो, सब्ज; जिस रंग से रँगो वही रंग चढ़ जायगा। देखो न, अगर कुछ अंग्रेजी पढ़ लो तो मुँह में अंग्रेजी शब्द आ जाते हैं - फुट-फट् इट्-मिट्।
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(सब हँसे।) और पैरों में बूट-जूता, सीटी बजाकर गाना – ये सब आ जाते हैं। और पण्डित संस्कृत पढ़े तो श्लोक आवृत्ति करने लगता है! मन को यदि कुसंग में रखो तो वैसी ही बातचीत, वैसी ही चिन्ता हो जाएगी। यदि भक्तों के साथ रखो तो ईश्वरचिन्तन, भगवत्प्रसंग – ये सब होंगे।
“मन ही को लेकर सब कुछ है। एक ओर स्त्री है और एक ओर सन्तान। स्त्री को एक भाव से और सन्तान को दूसरे भाव से प्यार करता है, किन्तु है एक ही मन।”
(६)
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (गीता, १८।६६)
ईसाई धर्म, ब्राह्मसमाज और पापवाद
श्रीरामकृष्ण (ब्राह्मभक्तों के प्रति) – मन ही में बन्धन है और मन ही में मुक्ति। मैं मुक्तपुरुष हूँ; चाहे संसार में रहूँ, चाहे अरण्य में, मुझे बन्धन कैसा? मैं ईश्वर की सन्तान हूँ; राजाधिराज का बेटा; मुझे भला कौन बाँध सकता है? साँप के काटने पर यदि दृढ़ता के साथ यह कहा जाय कि 'विष नहीं है' तो सचमुच विष उतर जाता है! उसी प्रकार दृढ़ता के साथ यह कहते कहते कि 'मैं बद्ध नहीं, मैं मुक्त हूँ', वास्तव में वैसा ही हो जाता है। मनुष्य मुक्त ही हो जाता है।
“किसी ने ईसाइयों की एक किताब दी थी; मैंने पढ़कर सुनाने के लिए कहा। उसमें केवल 'पाप' 'पाप' ही भरा था। (केशव के प्रति) तुम्हारे ब्राह्मसमाज में भी केवल 'पाप' 'पाप' ही सुनायी देता है। जो व्यक्ति बार बार 'मैं बद्ध हूँ' 'मैं बद्ध हूँ' कहता रहता है वह बद्ध ही हो जाता है, जो दिन-रात 'मैं पापी हूँ' 'मैं पापी हूँ' यही रटता रहता है, वह सचमुच पापी ही बन जाता है।
“ईश्वर के नाम पर इस प्रकार का ज्वलन्त विश्वास होना चाहिए – ‘क्या! मैंने उनका नाम लिया है, अब भी मुझमें पाप रह सकता है! मुझमें भला पाप कैसा! मुझे भलाबन्धन कैसा!’ कृष्णकिशोर सनातनी हिन्दू था – सदाचारनिष्ठ ब्राह्मण! एक बार वह वृन्दावन गया था। एक दिन घूमते घूमते उसे प्यास लगी। उसने एक कुएँ के पास जाकर देखा, एक आदमी खड़ा है। उसने उससे कहा, ‘क्यों रे तू मुझे एक लोटा पानी पिला सकता है? तू कौन जात है?’ वह बोला, ‘महाराज, मैं नीची जाति का हूँ – चमार हूँ।’ कृष्णकिशोर ने कहा, ‘तू शिव शिव कह। ले, अब पानी खींच दे।’
“भगवान् का नाम लेने से मनुष्य का शरीर, मन – सब कुछ शुद्ध हो जाता है।
“केवल ‘पाप’ ‘नरक’ यही सब बातें क्यों? एक बार कहो कि जो कुछ अयोग्य काम किए हैं, उन्हें फिर नहीं करूँगा, और उनके नाम पर विश्वास रखो।”
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श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त होकर नाममाहात्म्य गाने लगे –
(भावार्थ) – “दुर्गा दुर्गा अगर जपूँ मैं जब मेरे निकलेंगे प्राण।
देखूँ कैसे नहीं तारती, कैसे हो करुणा की खान।।”
“मैंने माँ के निकट केवल भक्ति माँगी थी। हाथ में फूल लेकर माँ के पादपद्मों में चढ़ाया था; कहा था, 'माँ, यह लो तुम्हारा पाप, यह लो तुम्हारा पुण्य, मुझे शुद्ध भक्ति दो; यह लो तुम्हारा ज्ञान, यह लो तुम्हारा अज्ञान, मुझे शुद्ध भक्ति दो; यह लो तुम्हारी शुचिता, यह लो तुम्हारी अशुचिता, मुझे शुद्ध भक्ति दो; यह लो तुम्हारा धर्म, यह लो तुम्हारा अधर्म, मुझे शुद्ध भक्ति दो।'
(ब्राह्मभक्तों के प्रति) – “एक रामप्रसाद का गीत सुनो –
(भावार्थ) – “चल मन घूमने चलें। कालीरूपी कल्पतरु के नीचे तुझे (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) चारों फल पड़े मिल जाएँगे। अपनी प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दो पत्नियों में से तू केवल निवृत्ति को ही साथ ले। उसके विवेक नामक बेटे से तत्त्वज्ञान की बातें पूछना। शुचि अशुचि दोनों को साथ लेकर तू दिव्यगृह में कब सोएगा ? जब इन दो सौतों में प्रीति स्थापित होगी तभी तू श्यामा माँ को पाएगा। अहंकार और अविद्या तेरे पिता और माता हैं – दोनों को भगा दे। यदि मोह तुझे पकड़कर खींचे तो तू धैर्यरूपी खूँटे को पकड़े रह। धर्म अधर्म इन दो बकरों को उपेक्षारूपी खूँटी से बाँधे रख। यदि वे नहीं मानें तो ज्ञानखड्ग के द्वारा उनका बलिदान कर देना। प्रवृत्ति नामक पहली पत्नी की सन्तानों को दूर ही से समझाना। यदि वे न मानें तो उन्हें ज्ञानसिन्धु में डुबो देना। रामप्रसाद कहता है, ऐसा करने पर तू यम को सही जवाब दे सकेगा और तभी तू सच्चा मन होगा।”
गाना समाप्त कर श्रीरामकृष्ण बोले – “संसार में रहकर ईश्वरलाभ क्यों नहीं होगा ? जनक राजा को हुआ था। रामप्रसाद ने कहा था, यह संसार 'धोखे की जगह' है। परन्तु ईश्वर के चरणकमलों में भक्ति होने पर –
“ 'यह संसार मौज की जगह है। मैं यहाँ खाता, पीता और मौज उड़ाता हूँ। जनक राजा महातेजस्वी था, उसकी किसी बात में कसर नहीं थी। उसने यह और वह – दोनों बाजू सम्हालकर दूध का प्याला पिया था।' (सब हँसने लगे)
गृहस्थ के लिए उपाय – एकान्तवास तथा विवेक
“परन्तु कोई एकदम फट से जनक राजा नहीं बन जाता। जनक राजा ने निर्जन में बहुत तपस्या की थी। संसार में रहते हुए भी बीच बीच में एकान्तवास करना चाहिए। गृहस्थी से बाहर निकलकर एकान्त में अकेले रहकर अगर भगवान् के लिए तीन दिन ही रोया जाय तो वह भी अच्छा है। यहाँ तक कि यदि अवसर पाकर एक ही दिन निर्जन में रहकर भगवच्चिन्तन किया जाए तो वह भी अच्छा है। लोग स्त्री-पुत्रों के लिए रोकर लोटाभर आँसू
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बहाते हैं, ईश्वर के लिए भला कौन रोता है? बीच बीच में निर्जन में रहकर भगवत्प्राप्ति के लिए साधना करनी चाहिए। संसार के भीतर, विशेषकर कामकाज की झंझट में रहकर प्रथम अवस्था में मन को स्थिर करते समय अनेक बाधाएँ आती हैं। जैसे रास्ते के किनारे लगाया हुआ पेड़; जिस समय वह पौधे की स्थिति में रहता है, उस समय घेरा न लगाने पर गाय-बकरियाँ खा जाती हैं। प्रथम अवस्था में घेरा। किन्तु बादमें तना मजबूत होने पर घेरेकी आवश्यकता नही रहती। फिर उसे हाथी बांधनेपर भी कुछ नहीं होता।
“रोग तो हुआ है सन्निपात का। पर जिस कमरे में सन्निपात का रोगी है, उसी कमरे में पानी का घड़ा और इमली का अचार रखा है। अगर रोगी को आराम पहुँचाना चाहते हो तो पहले उसे उस कमरे से हटाना होगा। संसारी जीव मानो सन्निपात का रोगी है; और विषय है पानी का घड़ा। विषयभोगतृष्णा मानो जलतृष्णा है। इमली, अचार की बात सिर्फ सोचते ही मुँह में पानी आ जाता है, वे चीजें पास नहीं लानी पड़तीं। ऐसी चीज रोगी के कमरे में ही रखी है। संसार में स्त्री-सहवास ऐसी ही चीज है। इसीलिए निर्जन में जाकर चिकित्सा कराना आवश्यक है।
“विवेक-वैराग्य प्राप्त करके संसार में प्रवेश करना चाहिए। संसारसमुद्र में काम-क्रोधादि मगर हैं। बदन में हल्दी मलकर पानी में उतरने पर मगर का डर नहीं रहता। विवेक-वैराग्य ही हल्दी है। सदसत्-विचार का नाम विवेक है। ईश्वर ही सत् हैं, नित्यवस्तु हैं बाकी सब असत् अनित्य, दो दिन के लिए है – यह बोध ही विवेक है। और ईश्वर के प्रति अनुराग चाहिए, प्रेम, आकर्षण चाहिए – जैसा गोपियों का कृष्ण के प्रति था। एक गाना सुनो –
(भावार्थ) – “विपिन में बंसी बज उठी। मुझे तो जाना ही होगा, श्याम मेरी राह देख रहा है। तुम लोग चलोगी या नहीं, बताओ। तुम लोगों के लिए श्याम एक नाम है, पर सखि, मेरे लिए श्याम हृदय की व्यथा है। बंसी तुम्हारे कान में बजती है, पर मेरे तो वह हृदय में बजती है। श्याम की बंसी बज रही है। हे राधे, अब चलो, तुम्हारे बिना कुंज में शोभा नहीं आती।”
श्रीरामकृष्ण ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से यह गीत गाते गाते केशव आदि भक्तों से कहा, “राधाकृष्ण को मानो या न मानो, पर उनके इस आकर्षण को तो ग्रहण करो! ईश्वर के लिए इस प्रकार की व्याकुलता हो, इसके लिए प्रयत्न करो। व्याकुलता के आते ही उन्हें प्राप्त किया जा सकता है।”
(७)
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥ (गीता, १२।४)
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९० श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२
भाटा शुरू हो गया। जहाज कलकत्ते की ओर द्रुतगति से बढ़ रहा है। इसलिए पुल पार कर कम्पनी के बगीचे की ओर और थोड़ी दूर तक ले जाने के लिए कप्तान को आदेश दिया गया। जहाज कितनी दूर आ पहुँचा है, इसकी अधिकांश लोगों को सुध नहीं है। वे मग्न होकर श्रीरामकृष्ण की बातें सुन रहे हैं। समय कैसे चला जा रहा है, इसका होश नहीं है।
अब मुरमुरे और नारियल के टुकड़े बाँटे गए। सब ने थोड़ा थोड़ा लेकर खाना शुरू किया। आनन्द की हाट लगी है। केशव ने मुरमुरे आदि लाने की व्यवस्था की थी। ऐसे समय श्रीरामकृष्ण के ध्यान में आया कि विजय और केशव दोनों ही संकुचित होकर बैठे हुए हैं। तब जिस प्रकार दो नादान बच्चों में झगड़ा हो जाने पर कोई बड़ा व्यक्ति समझौता करा देता है, उसी प्रकार श्रीरामकृष्ण उन दोनों के बीच समझौता कराने लगे। ‘सर्वभूतहिते रत।’
श्रीरामकृष्ण (केशव के प्रति) – अजी! ये विजय आए हैं। तुम लोगों का झगड़ा-विवाद मानो शिव और राम की लड़ाई है। राम के गुरु शिव हैं। दोनों में युद्ध भी हुआ, फिर सन्धि भी हो गयी। पर शिव के भूतप्रेत और राम के बन्दर ऐसे थे कि उनका झगड़ना किचकिचाना रुकता ही न था। (सब जोर से हँस पड़े।)
“अपने ही लोग हैं। ऐसा होता ही है। लव-कुश ने भी राम के साथ युद्ध किया था। फिर जानते हो न माँ और बेटी अलग से मंगलवार का व्रत रखती हैं, मानो माँ का मंगल और बेटी का मंगल अलग अलग है। परन्तु वास्तव में तो माँ के मंगल से बेटी का मंगल होता है और बेटी के मंगल से माँ का। इसी तरह तुममें से एक के एक समाज है, अब दूसरे को भी एक चाहिए। (सब हँसते हैं।) पर यह सब जरूरी है। तुम कहोगे कि जहाँ भगवान् ने स्वयं लीला की, वहाँ जटिला-कुटिला की क्या जरूरत थी ? पर जटिला-कुटिला के सिवा लीला पुष्ट नहीं हो पाती। बिना उनके रंग नहीं चढ़ता। (सब जोर से हँसते हैं।)
‘रामानुज विशिष्टाद्वैतवादी थे। उनके गुरु थे अद्वैतवादी। आखिर दोनों में अनबन होने लगी। गुरु-शिष्य आपस में एक दूसरे के मत का खण्डन करने लगे। ऐसा हुआ करता है। चाहे जो कुछ हो, फिर भी हैं तो अपने ही।”
(८)
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।। (गीता, ११।४३)
गुरुगिरी और ब्राह्मसमाज। एक सच्चिदानन्द ही गुरु हैं।
सब लोग आनन्दित हैं। श्रीरामकृष्ण केशव से कहते हैं, “तुम स्वभाव परखकर
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शिष्य नहीं बनाते, इसीलिए आपस में इस तरह की फूट हुआ करती है।
“सभी मनुष्य दिखने में एक सरीखे हैं, पर हर एक का स्वभाव भिन्न है। किसी के भीतर सत्त्वगुण अधिक है, किसी के भीतर रजोगुण तो किसी के भीतर तमोगुण। गुझियाँ बाहर से एक-सी दिखायी देती हैं पर किसी के भीतर खोया, किसी के भीतर नारियल तो किसी के भीतर उड़द की दाल होती है। (सब हँसते हैं।)
“मेरा भाव क्या है, जानते हो ? मैं खाता, पीता और मजे में रहता हूँ, बाकी की सब माँ ही जाने। तीन बातों से मेरी देह में मानो काँटा चूभ जाता है – गुरु, कर्ता और बाबा।
“गुरु एकमात्र सच्चिदानन्द ही हैं। वे ही सब को शिक्षा देंगे। मेरा सन्तानभाव है। वैसे मनुष्य-गुरु तो लाखों मिलते हैं। सभी गुरु बनना चाहते हैं। शिष्य कौन बनना चाहता है?
“लोकशिक्षा देना बड़ा कठिन है। यदि ईश्वर का साक्षात्कार हो और वे आदेश दें, तो यह सम्भव हो सकता है। नारद, शुकदेव आदि को आदेश हुआ था, शंकराचार्य को आदेश हुआ था। आदेश न मिलने से तुम्हारी बात कौन सुनेगा ? कलकत्ते के लोगों की हुल्लड़बाजी तो जानते ही हो! जब तक नीचे लकड़ी जलती है तब दूध उफनकर ऊपर आता है। लकड़ी को खींच लेते ही सब कुछ शान्त हो जाता है। कलकत्ते के लोग हुल्लड़बाज हैं। अभी एक जगह कुआँ खोद रहे हैं – पानी चाहिए। वहाँ पत्थर निकलने लगे कि खोदना छोड़ दिया! और एक जगह खोदना शुरू किया। वहाँ रेती निकलने लगी कि वह जगह भी छोड़ दी। फिर दूसरी जगह खोदने ही लगे। यही तो उनका हाल है।
“परन्तु आदेश मिला है यह केवल मन में सोच लेने से नहीं चलता। ईश्वर सचमुच ही दर्शन देते हैं और बातचीत करते हैं। इसी अवस्था में आदेश प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार आदेशप्राप्त व्यक्ति की बातों में कितना जोर होता है! पर्वत भी टल जाता है। सिर्फ लेक्चर से क्या होगा ? लोक कुछ दिन सुनेंगे, फिर भूल जाएँगे; उसके अनुसार नहीं चलेंगे।
पूर्वकथा – भावनेत्रोंसे हालदारपुकुर का दर्शन
“उस ओर हालदारपुकुर नाम का एक तालाब है। कुछ लोग उसके किनारे रोज सबेरे पाखाना फिरा करते थे। जो लोग सबेरे स्नानादि के लिए आते वे यह देखकर उनके नाम से खूब चिल्लाते, खूब कोसते। पर दूसरे दिन फिर वही हाल! पाखाना फिरना बन्द नहीं होता था। तब लोगों ने कम्पनी को यह बात जतायी। कम्पनीवालों ने एक चपरासी को भेजा। जब उस चपरासी ने आकर एक कागज चिपका दिया – ‘यहाँ पाखाना न फिरें’ – तब सब बन्द हो गया। (सब हँसते हैं)
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९२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२
“लोकशिक्षा देना हो तो चपरास चाहिए। नहीं तो वह हास्यास्पद बात हो जाती है। खुद को ही नहीं मिली, दूसरों को देने चला। एक अन्धा दूसरे अन्धे को राह बताते हुए ले चला है। (हास्य) इससे हित होने के बजाय विपरीत ही होता है। ईश्वरलाभ होने पर अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है, उसी समय किसे कौनसा रोग है यह समझ में आता है, योग्य उपदेश दिया जा सकता है।
‘‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहं इति मन्यते’’
‘‘आदेश न मिलने पर ‘मैं लोगों को शिक्षा दे रहा हूँ’ इस प्रकार का अहंकार होता है। अहंकार होता है अज्ञान के कारण। अज्ञान से ऐसा लगता है कि मैं कर्ता हूँ। ईश्वर ही कर्ता हैं, ईश्वर सब कुछ कर रहे हैं, मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ – यह बोध हो जाने पर तो मनुष्य जीवन्मुक्त हो गया। ‘मैं कर्ता हूँ’ इस बोध के कारण ही इतना दुःख, इतनी अशान्ति पैदा होती है।
(९)
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः।। ३।१९
केशवादि ब्राह्मभक्तों को कर्मयोगसम्बन्धी उपदेश
श्रीरामकृष्ण (केशवादि से) – तुम लोग ‘दुनिया का भला’ करने की बातें करते हो। क्या दुनिया इतनी छोटी है और तुम कौन हो दुनिया का भला करनेवाले ? साधना के द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार कर लो, उनका लाभ कर लो। वे यदि शक्ति दें तो सब का हित कर सकोगे, अन्यथा नहीं।
एक भक्त – जब तक ईश्वरलाभ न हो जाय तब तक क्या सब कर्म त्याग दें ?
श्रीरामकृष्ण – नहीं, कर्मों का त्याग क्यों करोगे ? ईश्वर का चिन्तन, उनका नामगुणगान, नित्यकर्म – यह सब करना पड़ेगा।
ब्राह्मभक्त – संसार का कर्म ? वैषयिक कर्म ?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, वह भी करो, संसारयात्रा के निर्वाह के लिए जितना आवश्यक हो उतना ही। परन्तु निर्जन में रो-रोकर ईश्वर से प्रार्थना करनी होगी, ताकि इन कर्मों को निष्काम भाव से किया जा सके। कहो, ‘हे ईश्वर, मेरे विषय-कर्म कम कर दो, क्योंकि प्रभो, मैं देख रहा हूँ कि ज्यादा कामकाज के आ पड़ने से मैं तुम्हें भूल जाता हूँ। सोचता हूँ कि मैं निष्काम कर्म कर रहा हूँ पर वह सकाम हो जाता है।’ दान-धर्म आदि अधिक करने गए कि नाम कमाने की इच्छा आ जाती है।
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२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ९३
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पूर्वकथा - शम्भु मल्लिक के साथ दानादि कर्मकाण्ड-सम्बन्ध में वार्तालाप
“शम्भु मल्लिक अस्पताल, दवाखाना, स्कूल, रास्ते, तालाब आदि बनवाने की बात कह रहा था। मैंने कहा, जो काम सामने आ पड़ा है, किए बिना नहीं चल सकता, उसी को निष्काम होकर करना चाहिए। जान-बूझकर ज्यादा कामों में उलझना ठीक नहीं – इससे ईश्वर का विस्मरण हो जाता है। कालीघाट में जाकर दान ही करने लग गए, काली के दर्शन हुए ही नहीं! (हास्य) पहले किसी तरह धक्काधुक्की खाकर भी कालीदर्शन कर लेना चाहिए, उसके बाद चाहे जितना दान करो या न करो, इच्छा हो तो खूब करो। ईश्वरलाभ के लिए ही कर्म है। इसीलिए शम्भु को कहा, अगर ईश्वर के दर्शन हों तो क्या तुम उनसे कहोगे कि कुछ अस्पताल और दवाखाने बनवा दो ? (हास्य) भक्त कभी इस प्रकार नहीं कहेगा। बल्कि वह तो कहेगा, 'प्रभो, मुझे अपने पादपद्मो में आश्रय दो, सदा अपने साथ रखो, अपने चरणकमलों के प्रति शुद्ध भक्ति दो'।
“कर्मयोग बड़ा कठिन है। शास्त्र में जिन कर्मों के बारे में कहा गया है, कलिकाल में उन्हें करना बड़ा कठिन है। लोग अन्नगतप्राण हैं – जीवन अन्न पर ही निर्भर है। अधिक कर्म करना सम्भव नहीं। बुखार होने पर यदि वैद्यजी से चिकित्सा करवाने जायें तो इधर रोगी खत्म हो जाता है। अधिक देरी सहन नहीं होती। आजकल डी. गुप्त का जमाना है। कलियुग में उपाय है भक्तियोग – भगवान् का नामगुणगान और प्रार्थना। भक्तियोग ही युगधर्म है। (ब्राह्मभक्तों के प्रति) तुम लोगों का मार्ग भी भक्तिमार्ग ही है, तुम लोग हरिनामसंकीर्तन करते हो, जगदम्बा का नामगुणगान करते हो, तुम धन्य हो! तुम्हारा भाव बहुत अच्छा है। वेदान्तवादियों की तरह तुम लोग संसार को स्वप्नवत् नहीं मानते। तुम उस तरह के ब्रह्मज्ञानी नहीं हो, तुम भक्त हो। तुम ईश्वर को व्यक्ति (Person) मानते हो, यह भी अच्छा भाव है। तुम लोग भक्त हो। व्याकुल होकर ईश्वर को पुकारने से उनके दर्शन अवश्य पाओगे।”
(१०)
सुरेन्द्र के मकान पर नरेन्द्र आदि के साथ
अब जहाज कोयलाघाट लौट आया। सब लोग उतरने की तैयारी करने लगे। कमरे से बाहर निकलते ही सब ने देखा, कोजागरी पूर्णिमा का पूर्णचन्द्र हँस रहा है, भागीरथी के जल पर मानो उसकी ज्योत्स्ना का लीलाविलास चल रहा है। श्रीरामकृष्ण के लिए गाड़ी मँगवायी गयी। कुछ देर बाद मास्टर और एक-दो भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण गाड़ी में बैठे। केशव के भतीजे नन्दलाल भी गाड़ी में बैठे, थोड़ी दूर तक साथ जाएँगे।
जब सब जन गाड़ी में बैठ गए तब श्रीरामकृष्ण ने पूछा, “वे कहाँ हैं?” अर्थात् केशव कहाँ हैं? देखते ही देखते केशव आ खड़े हुए। चेहरे पर मुस्कान थी। आकर
९४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२
पूछा, “कौन कौन साथ जा रहे हैं?” गाड़ी में सब के बैठ जाने पर केशव ने भूमिष्ठ होकर श्रीरामकृष्ण की पदधूलि ग्रहण की। श्रीरामकृष्ण ने भी स्नेहपूर्ण शब्दों में विदा ली।
गाड़ी चलने लगी। यह अंग्रेजों का मुहल्ला है। सुन्दर राजमार्ग है। दोनों ओर सुन्दर सुन्दर इमारतें हैं। पूर्णचन्द्र उदित हुआ है; इमारतें मानो चन्द्र की विमल, शीतल किरणों में विश्राम कर रही हैं। दरवाजों पर गैसबत्तियाँ, कमरों के भीतर दीपमालाएँ जगमगा रही हैं। जगह जगह पर हारमोनियम-पियानो के साथ अंग्रेज महिलाएँ गा रही हैं। श्रीरामकृष्ण आनन्द से मृदु हास्य करते हुए जा रहे हैं। एक जगह एकाएक बोल उठे, “मुझे प्यास लग रही है, क्या किया जाय?” नन्दलाल ने इण्डिया क्लब के पास गाड़ी रुकवायी और ऊपर जाकर काँच के गिलास में पानी ले आए। श्रीरामकृष्ण ने मुसकराते हुए पूछा, “गिलास धोया है न?” नन्दलाल के “हाँ” कहने पर श्रीरामकृष्ण ने उस गिलास का पानी पी लिया।
आपका बालक जैसा स्वभाव है। गाड़ी के चलने लगते ही बाहर झाँककर आसपास के मनुष्य, गाड़ी-घोड़े, चाँदनी आदि देखने लगे। हर एक बात में आनन्दित हो रहे हैं।
नन्दलाल कलुटोला में उतरे। श्रीरामकृष्ण की गाड़ी सिमुलिया स्ट्रीट में श्री सुरेश मित्र के मकान के सामने आ पहुँची। श्रीरामकृष्ण इन्हें सुरेन्द्र कहा करते थे। सुरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के परम भक्त हैं।
परन्तु सुरेन्द्र घर में नहीं हैं। अपने नये बगीचे में गए हैं। घर के लोगों ने बैठने के लिए नीचे का कमरा खोल दिया। गाड़ी का किराया देना होगा। कौन देगा ? अगर सुरेन्द्र होते तो वे ही देते। श्रीरामकृष्ण ने एक भक्त से कहा, “किराया घर की स्त्रियों से माँग लो न! क्या वे नहीं जानतीं कि उनके पति वहाँ आया-जाया करते हैं?” (सब हँसते हैं।)
नरेन्द्र उसी मुहल्ले में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र को बुला लाने कहा। घरवालों ने श्रीरामकृष्ण को दूसरे मंजले पर ले जाकर बैठाया। कमरे की फर्श पर बिछायत बिछी हुई है, उस पर दो-चार तकिये रखे हैं। दीवार पर सुरेन्द्र के द्वारा विशेष प्रयत्नपूर्वक बनवावाया हुआ तैलचित्र है, जिसमें श्रीरामकृष्ण केशव को हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध आदि सब धर्म तथा वैष्णव, शाक्त, शैव आदि सब सम्प्रदायों का समन्वय दिखला रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण प्रसन्न बैठकर मुसकराते हुए बातचीत कर रहे हैं। इतने में नरेन्द्र आ पहुँचे। अब तो श्रीरामकृष्ण का आनन्द मानो द्विगुणित हो उठा। आपने कहा, “आज केशव सेन के साथ जहाज में बैठकर घूमने गया था। विजय था, ये सब लोग थे।” मास्टर को निर्देशित करते हुए कहा, “इनसे पूछो, विजय और केशव को मैंने कैसे माँ-बेटी का मंगलवार, जटिला-कुटिला के बिना लीला की पुष्टि नहीं होती – ये सब बातें कहीं। (मास्टर से) क्यों जी?”
मास्टर – जी हाँ।
रात हो गयी पर अब भी सुरेन्द्र नहीं लौटे। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर जाएँगे, अब
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२७ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १३ ९५
अधिक देर नहीं की जा सकती, रात के साढ़े दस बज गए हैं। राह में चन्द्रमा का प्रकाश छाया है।
गाड़ी आयी। श्रीरामकृष्ण चढ़े। नरेन्द्र और मास्टर ने उन्हें प्रणाम किया और दोनों कलकत्ते में अपने अपने घर लौटे।
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परिच्छेद १४
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परिच्छेद १४
सींती का ब्राह्मसमाज – शिवनाथ आदि ब्राह्मभक्तों के साथ वार्तालाप और आनन्द
(१)
उत्सवमन्दिर
भगवान् श्रीरामकृष्ण सींती का ब्राह्मसमाज देखने आए हैं। २८ अक्टूबर १८८२ ई., शनिवार, आश्विन की कृष्णा द्वितीया है।
आज यहाँ ब्राह्मसमाज के छठे महीने का उत्सव होगा। इसीलिए भगवान् श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रण देकर बुलाया है। दिन के तीन-चार बजे का समय है, श्रीरामकृष्ण कुछ भक्तों के साथ गाड़ी पर चढ़कर दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर से श्रीयुत वेणीमाधव पाल के मनोहर बगीचे में पहुँचे हैं। इसी बगीचे में ब्राह्मसमाज का अधिवेशन हुआ करता है। ब्राह्मसमाज को वे बहुत प्यार करते हैं। ब्राह्मभक्त भी उन्हें बड़ी श्रद्धाभक्ति से देखते हैं। अभी कल ही शुक्रवार के दिन, शाम को आप केशव सेन और भक्तों के साथ जहाज पर चढ़कर हवाखोरी को निकले थे।
सींती पाइकपाड़ा के पास है। कलकत्ते से तीन मील, उत्तर दिशा में। स्थान निर्जन और मनोहर है; ईश्वरोपासना के लिए अत्यन्त उपयोगी है। बगीचे के मालिक साल में दो बार उत्सव मनाते हैं; एक बार शरत्-काल में और एक बार वसन्त में। इस महोत्सव में वे कलकत्ते और सींती के आसपास के ग्रामवासी अनेक भक्तों को निमन्त्रण देते हैं। अतएव आज कलकत्ते से शिवनाथ आदि भक्त आए हैं। इनमें से अनेक प्रातःकाल की उपासना में सम्मिलित हुए थे। वे सब सायंकालीन उपासना की प्रतीक्षा कर रहे हैं। विशेषतः उन लोगों ने सुना है कि अपराह्न में महापुरुष का आगमन होगा, अतएव उनकी आनन्द-मूर्ति देखेंगे, उनका हृदयमुग्धकारी वचनामृत पान करेंगे, मधुर संकीर्तन सुनेंगे और देखेंगे भगवत्-प्रेममय देवदुर्लभ नृत्य।
दोपहर को बगीचे में आदमी ठसाठस भर गए हैं। कोई लतामण्डप की छाया में बेंच पर बैठा हुआ है, कोई सुन्दर तालाब के किनारे मित्रों के साथ घूम रहा है। कितने ही लोग
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समाजगृह में पहले ही से जगह लेकर आसन पर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण के आने की बाट जोह रहे हैं। चारों ओर आनन्द उमड़ रहा है। शरद् के नील आकाश में भी आनन्द की छाया झलक रही है। बाग के फूलों से लदे हुए पेड़ों और लताओं से छानकर आती हुई हवा भक्तों के हृदय में आनन्द का एक झोंका लगा जाती है। सारी प्रकृति मानो मधुर स्वर से गा रही है – 'आज हर्ष-शीतल-समीर भरते भक्तों के उर में हैं विभु।' सभी उत्कण्ठित हो रहे हैं, ऐसे समय श्रीरामकृष्ण की गाड़ी आकर समाजगृह के सामने खड़ी हो गयी।
सभी ने उठकर महापुरुष का स्वागत किया। वे आये हैं – सुनते ही लोगों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया।
समाजगृह के प्रधान कमरे में वेदी बनायी गयी है। वह जगह आदमियों से भर गयी है। सामने दालान है; वहाँ श्रीरामकृष्ण बैठे हैं; वहाँ भी लोग जम गए हैं। दालान के दोनों ओर दो कमरे हैं – वहाँ भी लोग हैं, – सभी दरवाजे पर खड़े हुए बड़े उत्सुक होकर श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं। दालान पर चढ़ने की सीढ़ियाँ बराबर दालान के एक छोर से दूसरे छोर तक हैं। इन सीढ़ियों पर भी अनेक लोग खड़े हैं। वहाँ से कुछ दूर पेड़ों और लतामण्डपों के नीचे रखी हुई बेंचों पर से भी लोग टक लगाकर महापुरुष के दर्शन कर रहे हैं। दोनों ओर फल और फूलों के पेड़ों की कतार लगी हुई है, – बीच में रास्ता है। सभी पेड़ हवा की झोंकों से धीरे धीरे डोल रहे हैं, मानो वे आनन्दमग्न हो मस्तक नवाकर उनका स्वागत कर रहे हों।
श्रीरामकृष्ण ने हँसते हुए आसन ग्रहण किया। सब की दृष्टि एक साथ उनकी आनन्दमूर्ति पर जा गिरी। जब तक रंगमंच पर खेल शुरू नहीं होता तब तक दर्शकवृन्दों में से कोई तो हँसता है, कोई विषयचर्चा छेड़ता है, कोई अकेला या दोस्तों के साथ टहलता है, कोई पान खाता है, कोई सिगरेट पीता है। परन्तु परदा उठते ही सब लोग बातचीत बन्द कर, अनन्यचित्त होकर एकाग्र दृष्टि से खेल देखने लगते हैं। अथवा, एक फूल से दूसरे फूल में मँडरानेवाले भौंरे कमल की खोज पाते ही दूसरे फूलों को छोड़कर पद्ममधु का पान करने के लिए भागे चले आते हैं।
(२)
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते। (गीता, १४।२६)
हँसमुख श्रीरामकृष्ण शिवनाथ आदि भक्तों की ओर स्नेह की दृष्टि फेरते हुए कहते हैं, “क्या शिवनाथ! तुम भी आये हो? देखो तुम लोग भक्त हो, तुम लोगों को देखकर बड़ा आनन्द होता है। गंजेड़ी का स्वभाव होता है कि दूसरे गंजेड़ी को देखते ही वह खुश हो जाता है; कभी तो उसे गले ही लगा लेता है। (शिवनाथ तथा अन्य सब हँसते हैं।)
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| ९८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ अक्टूबर, १८८२ |
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संसारी लोगों का स्वभाव। नाममाहात्म्य
श्रीरामकृष्ण – जिन्हें मैं देखता हूँ कि मन ईश्वर पर नहीं है, उनसे कहता हूँ 'तुम कुछ देर वहाँ जाकर बैठो' या कह देता हूँ, 'जाओ, इमारतें (रानी रासमणि के मन्दिर आदि) देखो।' (सब हँसे।)
“कभी तो देखा है कि भक्तों के साथ निकम्मे आदमी आए हैं। उनमें बड़ी विषयबुद्धि रहती है। ईश्वरी चर्चा नहीं सुहाती। भक्त तो बड़ी देर तक मुझसे ईश्वरी वार्तालाप करते हैं, पर वे लोग उधर बैठे नहीं रह सकते; तड़फड़ाते हैं। बार बार कानों में फिसफिसाते हुए कहते हैं, 'कब चलोगे – कब चलोगे?' उन्होंने अगर कहा, 'ठहरो भी, जरा देर बाद चलते हैं', तो इन लोगों ने रूठकर कहा, 'तो तुम बातचीत करो, हम नाव पर चलकर बैठते हैं।' (सब हँसे।)
“संसारी मनुष्यों से यदि कहो कि सब छोड़-छाड़कर ईश्वर के पादपद्मों में मन लगाओ तो वे कभी न सुनेंगे। यही कारण है कि गौरांग और नित्यानन्द दोनों भाइयों ने आपस में विचार करके यह व्यवस्था की – 'मागुर माछेर झोल (मागुर मछली की रसदार तरकारी), युवती मेयेर कोल (युवती स्त्री का अंक), बोल हरि बोल।' प्रथम दोनों के लोभ से बहुत आदमी 'हरि बोल' में शामिल होते थे। फिर तो हरिनामामृत का कुछ स्वाद पाते ही वे समझ जाते थे कि 'मागुर माछेर झोल' और कुछ नहीं है, – ईश्वरप्रेम के जो आँसू उमड़ते हैं, वही है। और युवती स्त्री है पृथ्वी – 'युवती स्त्री का अंक' अर्थात् भगवत्-प्रेम के कारण धूलि में लोटपोट हो जाना।
“नित्यानन्द किसी तरह हरिनाम करा लेते थे। चैतन्यदेव ने कहा है, ईश्वर के नाम का बड़ा माहात्म्य है। फल जल्दी न मिलने पर भी कभी न कभी अवश्य प्राप्त होगा। जैसे, कोई पक्के मकान के आले में बीज रखा गया था। बहुत दिनों के बाद जब मकान गिर गया – मिट्टी में मिल गया, तब भी उस बीज से पेड़ पैदा हुआ और उसमें फल भी लगे।”
मनुष्यप्रकृति तथा तीन गुण। भक्ति का सत्त्व, रज, तम।
श्रीरामकृष्ण – जैसे संसारियों में सत्त्व, रज और तम – ये तीनों गुण हैं, भक्ति में भी सत्त्व, रज और तम तीन गुण हैं।
“संसारियों का सत्त्वगुण कैसा होता है, जानते हो? घर यहाँ टूटा है, वहाँ टूटा है – मरम्मत नहीं कराते। पूजागृह के बरामदे में कबूतरों की विष्ठा पड़ी है। आँगन में काई जम गयी है। होश तक नहीं। असबाब सब पुराने हो गए हैं। ठीक-ठाक करने की कोशिश नहीं करते। कपड़ा जो मिला वही सही। देखने में सीधेसादे, शान्त, दयालु, मिलनसार, कभी किसी का बुरा नहीं चाहते।
“और फिर संसारियों के रजोगुण के भी लक्षण हैं। जेब-घड़ी, चेन, उँगलियों में
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२८ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १४ | ९९
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दो-तीन अँगुठियाँ, मकान की चीजें बड़ी साफ, दीवार पर क्वीन (रानी) की तस्वीर, राजपुत्र की तस्वीर, किसी बड़े आदमी की तस्वीर। मकान चूने से पुता हुआ – कहीं एक दाग तक नहीं। तरह तरह की अच्छी पोशाक। नौकरों के भी वर्दियाँ। – आदि आदि।
“संसारियों के तमोगुण के लक्षण हैं – निद्रा, काम-क्रोध, अहंकार – यही सब।
“और भक्ति का भी सत्त्व है। जिस भक्त में सत्त्वगुण है वह एकान्त में ध्यान करता है। कभी तो वह मसहरी के भीतर ध्यान करता है। लोग समझते हैं कि आप सो रहे हैं, शायद रात को आँख नहीं लगी, इसलिए आज उठने में देर हो रही है। इधर शरीर का ख्याल बस भूख मिटाने तक, साग-पात पाने ही से चल गया। न भोजन में भरमार, न पोशाक में टीम-टाम और न घर में चीजों का जमघट और फिर सतोगुणी भक्त कभी खुशामद करके धन नहीं कमाता।
“भक्ति का रज जिस भक्त को होता है वह तिलक लगाता है, रुद्राक्ष की माला पहनता है, जिसके बीच बीच सोने के दाने जड़े रहते हैं (सब हँसते हैं।) जब पूजा करता है तब पीताम्बर पहन लेता है!”
(३)
क्लैब्यं मास्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप।। (गीता, २।३)
श्रीरामकृष्ण – जिसे भक्ति का तम होता है उसका विश्वास अटूट है। इस प्रकार का भक्त हठपूर्वक ईश्वर से भिड़ जाता है, मानो डाका डालकर धन छीन लेता है। 'मारो, काटो, बाँधो'! इस तरह डाका डालने का भाव है।
नाममाहात्म्य तथा पाप
श्रीरामकृष्ण ऊर्ध्वदृष्टि हैं, प्रेमरस से भरे मधुर कण्ठ से गा रहे हैं, भाव यह है: –
“ 'काली काली' जपते हुए यदि मेरे शरीर का अन्त हो तो गया गंगा-काशी-कांची-प्रभास आदि की परवाह कौन करता है ? हे काली, तुम्हारा भक्त पूजा-सन्ध्यादि नहीं चाहता, सन्ध्या खुद उसकी खोज में फिरती है, पर पता नहीं लगा सकती। दया-व्रत-दान आदि पर उसका मन नहीं जाता। मदन के याग-यज्ञ ब्रह्ममयी के रक्तिम चरणों में होते हैं। काली के नाम का गुण, जिसे देवाधिदेव महादेव पाँचों मुख से गाते हैं, कौन जान सकता है ?
श्रीरामकृष्ण भावोन्मत्त हो मानो अग्निमन्त्र से दीक्षित होकर गाने लगे। गीत का आशय यह है :–
“ 'यदि मैं 'दुर्गा दुर्गा' जपता हुआ मरूँ तो अन्त में इस दीन को, हे शंकरी, देखूँगा तुम कैसे नहीं तारती हो।' ”
श्रीरामकृष्ण – “क्या! मैंने उनका नाम लिया है – मुझे पाप! मैं उनकी सन्तान हूँ
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| १०० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ अक्टूबर, १८८२ |
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- उनके ऐश्वर्य का अधिकारी हूँ!” इस प्रकार की जिद चाहिए।
“तमोगुण को ईश्वर की ओर फेर देने से ईश्वर-लाभ होता है। उनसे हठ करो; वे कोई दूसरे तो नहीं, अपने ही तो हैं।
“फिर देखो, यह तमोगुण दूसरों के हित पर लगाया जा सकता है। वैद्य तीन प्रकार के होते हैं; – उत्तम, मध्यम और अधम। जो वैद्य नाड़ी देखकर ‘दवा खा लेना’ कहकर चला जाता है, वह अधम वैद्य है। रोगी ने दवा खाई या नहीं, इसकी खबर वह नहीं लेता। जो वैद्य रोगी को दवा खाने के लिए तरह तरह से समझाता बुझाता है, मीठी बातों से कहता है, ‘अजी दवा नहीं खाओगे तो अच्छे किस तरह होगे! भैया, खा लो, अच्छा मैं खुद खरल करके खिलाता हूँ’, वह मध्यम वैद्य है और जो वैद्य रोगी को किसी तरह दवा न खाते हुए देखकर छाती पर चढ़ बैठ जबरदस्ती दवा खिलाता है, वह उत्तम वैद्य है। यह वैद्यों का तमोगुण है, इस गुण से रोगी का उपकार होता है, अपकार नहीं।
तीन प्रकार के आचार्य
“वैद्यों के समान तीन प्रकार के आचार्य भी हैं। धर्मोपदेश देकर जो शिष्यों की फिर कोई खबर नहीं लेते वे आचार्य अधम हैं। जो शिष्यों के हित के लिए बार बार उन्हें समझाते हैं जिससे कि वे उपदेशों की धारणा कर सकें, बहुत विनय-प्रार्थना करते हैं, प्यार करते हैं, – वे मध्यम आचार्य हैं। और जब शिष्यों को किसी तरह उपदेश न सुनते देख कोई कोई आचार्य बलपूर्वक उन्हें राह पर लाते हैं, तो उन्हें उत्तम आचार्य समझना चाहिए।”
(४)
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। (तैत्तिरीय उपनिषत् २/४)
ब्रह्म का स्वरूप अनिर्वचनीय है
एक ब्राह्मभक्त ने पूछा – ईश्वर साकार हैं या निराकार ?
श्रीरामकृष्ण – उनकी इति नहीं की जा सकती। वे निराकार हैं, फिर साकार भी हैं। भक्तों के लिए वे साकार हैं। जो ज्ञानी हैं – संसार को जिन्होंने स्वप्नवत् मान लिया है, उनके लिए वे निराकार हैं। भक्त का यह विश्वास है कि मैं एक पृथक् सत्ता हूँ तथा संसार एक पृथक सत्ता; इसलिए भक्त के निकट ईश्वर ‘व्यक्ति’ (Personal God) के रूप में आते हैं। ज्ञानी – जैसे वेदान्तवादी – सिर्फ ‘नेति नेति’ विचार करता है। विचार करने पर उसे यह बोध होता है कि मैं मिथ्या हूँ, संसार भी मिथ्या – स्वप्नवत् है। ज्ञानी ब्रह्म को बोधरूप देखता है परन्तु वे क्या हैं, यह मुँह से नहीं कह सकता।
“वे किस तरह हैं, जानते हो ? मानो सच्चिदानन्द समुद्र है जिसका ओर-छोर नहीं।
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२८ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १४ १०१
२८ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १४ १०१
भक्तों के पास वे व्यक्तभाव से कभी कभी साकाररूप धारण करते हैं। ज्ञान-सूर्य का उदय होने पर वह बर्फ गल जाती है, तब ईश्वर के व्यक्तित्व का बोध नहीं रह जाता – उनका रूप भी नहीं दिखायी देता। वे क्या हैं, मुँह, से नहीं कहा जा सकता। कहे कौन! जो कहेंगे वे ही नहीं रह गए, उनका 'मैं' ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता।
"विचार करते करते फिर 'मैं' नहीं रह जाता। जब तुम प्याज छीलते हो, तब पहले लाल छिलके निकलते हैं। फिर सफेद मोटे छिलके। इसी तरह लगातार छीलते जाओ तो भीतर ढूँढ़ने से कुछ नहीं मिलता।
"जहाँ अपना 'मैं' खोजे नहीं मिलता – और खोजे भी कौन? – वहाँ ब्रह्म के स्वरूप का बोध किस प्रकार होता है, यह कौन कहे! नमक का एक पुतला समुद्र की थाह लेने गया। समुद्र में ज्योंही उतरा कि गलकर पानी हो गया। फिर खबर कौन दे?
"पूर्ण ज्ञान का लक्षण यह है, – पूर्ण ज्ञान होने पर मनुष्य चुप हो जाता है। तब 'मैं' रूपी नमक का पुतला सच्चिदानन्दरूपी समुद्र में गलकर एक हो जाता है, फिर जरा भी भेदबुद्धि नहीं रह जाती।
"विचार करने का जब तक अन्त नहीं होता, तब तक लोग तर्क पर तुले रहते हैं। अन्त हुआ कि चुप हो गए। घड़ा भर जाने से – घड़े का जल और तालाब का जल एक हो जाने से – फिर शब्द नहीं होता। जब तक घड़ा भर नहीं जाता, शब्द तभी तक होता है।
"पहले के लोग कहते थे, काले पानी में जहाज जाने से फिर लौट नहीं सकता।
मैं पन नहीं जा सकता
" 'मैं' मरा कि बला टली। (हास्य) विचार चाहे लाख करो पर 'मैं' दूर नहीं होता। तुम्हारे और हमारे लिए 'मैं भक्त हूँ' यह अभिमान अच्छा है।
"भक्तों के लिए सगुण ब्रह्म हैं अर्थात् वे सगुण अर्थात् मनुष्य के रूप में दर्शन देते हैं। प्रार्थनाओं के सुननेवाले वे ही हैं। तुम लोग जो प्रार्थना करते हो वह उन्हीं से करते हो। तुम लोग न वेदान्तवादी हो, न ज्ञानी; तुम लोग भक्त हो। साकार रूप मानो चाहे न मानो, इसमें कुछ हानि नहीं; केवल यह ज्ञान रहने ही से काम होगा कि ईश्वर एक वह व्यक्ति हैं जो प्रार्थनाओं को सुनते हैं, सृजन, पालन और प्रलय करते हैं, जिनमें अनन्त शक्ति है।
"भक्तिमार्ग से ही वे जल्दी मिलते हैं।"
(५)
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।। (गीता, ११।५४)
| १०२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ अक्टूबर, १८८२ |
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ईश्वरदर्शन - साकार तथा निराकार
एक ब्राह्मभक्त ने पूछा, “महाराज, ईश्वर को क्या कोई देख सकता है? अगर देख सकता है तो हमें वे क्यों नहीं देखने को मिलते?”
श्रीरामकृष्ण – हाँ, वे अवश्य देखने को मिलते हैं। साकार रूप देखने में आता है और फिर अरूप भी दीख पड़ता है, परन्तु यह तुम्हें समझाऊँ किस तरह?
ब्राह्मभक्त – हम उन्हें किस उपाय से देख सकते हैं?
श्रीरामकृष्ण – व्याकुल होकर उनके लिए रो सकते हो? लड़के के लिए, स्त्री के लिए, धन के लिए लोग आँसुओं की झड़ी बाँध देते हैं, परन्तु ईश्वर के लिए कौन रोता है? जब तक लड़का खिलौने पर भूला रहता है तब तक माँ रोटी पकाना आदि घरगृहस्थी के कामों में लगी रहती है। जब लड़के को खिलौना नहीं सुहाता, उसे फेंक, गला फाड़कर रोने लगता है, तब माँ तवा उतारकर दौड़ आती है, – बच्चे को गोद में उठा लेती है।
ब्राह्मभक्त – महाराज, ईश्वर के स्वरूप पर इतने भिन्न भिन्न मत क्यों हैं? कोई कहता है साकार और कोई कहता है निराकार। फिर साकारवादियों से तो अनेक रूपों की चर्चा सुन पड़ती है। यह गोरखधन्धा क्यों रचा है?
श्रीरामकृष्ण – जो भक्त जिस प्रकार देखता है वह वैसा ही समझता है। वास्तव में गोरखधन्धा कुछ भी नहीं। यदि उन्हें कोई किसी तरह एक बार प्राप्त कर सके, तो वे सब समझा देते हैं। उस मुहल्ले में गए ही नहीं, – कुल खबर कैसे पाओगे?
“एक कहानी सुनो। एक आदमी शौच के लिए जंगल गया। उसने देखा कि पेड़ पर एक जन्तु बैठा है। लौटकर उसने एक दूसरे से कहा – ‘देखो जी, उस पेड़ पर हमने एक लाल रंग का सुन्दर जीव देखा है।’ उस आदमी ने जवाब दिया – ‘जब मैं शौच के लिए गया था तब मैंने भी देखा; पर उसका रंग लाल तो नहीं है – वह तो हरा है!’ तीसरे ने कहा – ‘नहीं जी नहीं, हमने भी देखा है, पीला है।’ इसी प्रकार और भी कुछ लोग थे जिनमें से किसी ने कहा भूरा, किसी ने बैंगनी, किसी ने आसमानी आदि आदि। अन्त में लड़ाई ठन गयी। तब उन लोगों ने पेड़ के नीचे जाकर देखा। वहाँ एक आदमी बैठा था। पूछने पर उसने कहा – ‘मैं इसी पेड़ के नीचे रहता हूँ। उस जीव को मैं खूब पहचानता हूँ। तुम लोगों ने जो कुछ कहा, सब सत्य है। वह कभी लाल, कभी हरा, कभी पीला, कभी आसमानी और भी न जाने कितने रंग बदलता है। वह बहुरूपिया है। और फिर कभी देखता हूँ, कोई रंग नहीं!’
“अर्थात् जो मनुष्य सर्वदा ईश्वर-चिन्तन करता है, वही जान सकता है कि उनका स्वरूप क्या है। वही मनुष्य जानता है कि वे अनेकानेक रूपों में दर्शन देते हैं, अनेक भावों में दीख पड़ते हैं, – वे सगुण हैं और निर्गुण भी। जो पेड़ के नीचे रहता है वही जानता है कि उस बहुरूपिया के कितने रंग हैं, – फिर कभी कभी तो कोई भी रंग नहीं रहता। दूसरे
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लोग केवल वादविवाद करके कष्ट उठाते हैं। कबीर कहते थे, – 'निराकार मेरा पिता है और साकार मेरी माँ।'
"भक्त को जो स्वरूप प्यारा है, उसी रूप से वे दर्शन देते हैं – वे भक्तवत्सल हैं न। पुराण में कहा है कि वीरभक्त हनुमान के लिए उन्होंने रामरूप धारण किया था।
कालीरूप तथा श्यामरूप की व्याख्या
"वेदान्त-विचार के सामने नाम-रूप कुछ नहीं ठहरते। उस विचार का चरम सिद्धान्त है – 'ब्रह्म सत्य और नामरूपोंवाला संसार मिथ्या।' जब तक 'मैं भक्त हूँ' यह अभिमान रहता है, तभी तक ईश्वर का रूप दिखायी देना और ईश्वर के सम्बन्ध में व्यक्ति (Person) का बोध रहना सम्भव है। विचार की दृष्टि से देखें तो भक्त के 'मैं भक्त हूँ' इस अभिमान ने उसे कुछ दूर कर रखा है।
"कालीरूप या श्यामरूप साढ़ेतीन हाथ का इसलिए है कि वह दूर है। दूर होने ही के कारण सूर्य छोटा दिखता है। पास जाओ तो इतना बड़ा मालूम होगा कि उसकी धारणा ही न कर सकोगे। और फिर कालीरूप या श्यामरूप श्यामवर्ण क्यों है? – क्योंकि वह भी दूर है। सरोवर का जल दूर से हरा, नीला या काला दीख पड़ता है; निकट जाकर हाथ में लेकर देखो, कोई रंग नहीं। आकाश दूर ही से नीला दिखायी देता है, पास जाकर देखो तो कोई रंग नहीं।
"इसलिए कहता हूँ, वेदान्त-दर्शन के विचार से ब्रह्म निर्गुण है। उनका स्वरूप क्या है, यह मुँह से नहीं कहा जा सकता। परन्तु जब तक तुम स्वयं सत्य हो तब तक संसार भी सत्य है, ईश्वर के नामरूप भी सत्य हैं, ईश्वर को एक व्यक्ति समझना भी सत्य है।
"तुम्हारा मार्ग भक्तिमार्ग है। यह बड़ा अच्छा है, सरल मार्ग है। अनन्त ईश्वर समझ में थोड़े ही आ सकते हैं? और उन्हें समझने की जरूरत भी क्या? यह दुर्लभ मनुष्यजन्म प्राप्त कर हमें वह करना चाहिए जिससे उनके चरण-कमलों में भक्ति हो।
"यदि लोटेभर पानी से हमारी प्यास बुझे तो तालाब में कितना पानी है, इसकी नापतौल करने की क्या जरूरत? अगर अद्धेभर शराब से हम मस्त हो जायें तो कलवार की दूकान में कितने मन शराब है, इसकी जाँच-पड़ताल करने का क्या काम? अनन्त का ज्ञान प्राप्त करने का क्या प्रयोजन?
(६)
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥ (गीता, ३।१७)
१०४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ अक्टूबर, १८८२
ईश्वरलाभ के लक्षण – सप्तभूमि तथा ब्रह्मज्ञान
“वेदों में ब्रह्मज्ञानी की अनेक प्रकार की अवस्थाओं का वर्णन है। ज्ञानमार्ग बड़ा कठिन मार्ग है। विषय-वासना – कामिनी-कांचन के प्रति आसक्ति – का लेशमात्र रहते ज्ञान नहीं होता। यह पथ कलिकाल में साधन करने योग्य नहीं।
“इस विषय में वेदों में सप्तभूमि (Seven Planes) का उल्लेख है। मन इन सात सोपानों पर विचरण किया करता है। जब वह संसार में रहता है तब लिंग, गुदा और नाभि उसके निवासस्थल हैं। तब वह उन्नत दशा पर नहीं रहता – केवल कामिनी-कांचन में लगा रहता है। मन की चौथी भूमि है हृदय। तब चैतन्य का उदय होता है, और मनुष्य को चारों ओर ज्योति दिखलायी पड़ती है। तब वह मनुष्य ईश्वरी ज्योति देखकर सविस्मय कह उठता है, ‘यह क्या है, यह क्या है!’ तब फिर नीचे (संसार की ओर) मन नहीं मुड़ता।
“मन की पंचम भूमि है कण्ठ। जिसका मन कण्ठ तक पहुँचा है उसकी सारी अविद्या, सम्पूर्ण अज्ञान दूर हो गया है। ईश्वरी प्रसंग के सिवा और कोई बात न तो सुनने को और न कहने को उसका जी चाहता है। यदि कोई व्यक्ति दूसरी चर्चा छेड़ता है तो वह वहाँ से उठ जाता है।
“मन की छठी भूमि कपाल है। मन वहाँ जाने से दिनरात ईश्वरी रूप के दर्शन होते हैं। उस समय भी कुछ ‘मैं’ रहता है। वह मनुष्य उस अनुपम रूप को देखकर मतवाले की तरह उसे छूने तथा गले लगाने को बढ़ता है, परन्तु पाता नहीं। जैसे लालटेन के भीतर बत्ती को जलते देखकर, मन में आता है कि छूना चाहें तो हम इसे छू सकते हैं, परन्तु काँच के आवरण के कारण हम उसे छू नहीं पाते।
“शिरोदेश सप्तम भूमि है। वहाँ मन जाने से समाधि होती है और ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म का प्रत्यक्ष दर्शन करता है। परन्तु उस अवस्था में शरीर अधिक दिन नहीं रहता है। सदा बेहोश, कुछ खाया नहीं जाता, मुँह में दूध डालने से भी गिर जाता है। इस भूमि में रहने से इक्कीस दिन के भीतर मृत्यु होती है। यही ब्रह्मज्ञानियों की अवस्था है। तुम लोगों के लिए भक्तिपथ है। भक्तिपथ बड़ा अच्छा और सहज है।
समाधि होनेपर कर्मत्याग – पूर्वकथा – श्रीरामकृष्ण का तर्पणादि कर्मत्याग
“मुझसे एक मनुष्य ने कहा था, ‘महाराज, मुझे आप समाधि सिखा सकते हैं?’ (सब हँसते हैं।)
“समाधि होने पर सब कर्म छूट जाते हैं। पूजा-जपादि कर्म, विषय-कर्म सब छूट जाते हैं। पहले-पहल कामों की बड़ी रेलपेल होती है, परन्तु ईश्वर की ओर जितना ही बढ़ोगे, कामों का आडम्बर उतना ही घटता जाएगा; यहाँ तक कि नामगुणकीर्तन तक छूट जाता है। (शिवनाथ से) जब तक तुम सभा में नहीं आए कि तब तक तुम्हारे नाम और गुणों
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२८ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १४ | १०५
की बड़ी चर्चा चलती रही। ज्योंही तुम आए कि वे सब बातें बन्द हो गयीं। तब तुम्हारे दर्शन से ही आनन्द मिलने लगा। लोग कहने लगे, ‘यह लो, शिवनाथ बाबू आ गए।’ फिर तुम्हारे बारे में और सब बातें बन्द हो जाती हैं।
“मेरी यह अवस्था होने पर गंगा में तर्पण करने के लिए जाकर मैंने देखा, उँगलियों के भीतर से पानी गिरा जा रहा है। तब हलधारी से रोते हुए पूछा, दादा, यह क्या हो गया ! हलधारी बोला, इसे ‘गलितहस्त’ कहते हैं। ईश्वरदर्शन के बाद तर्पणादि कर्म नहीं रह जाते।
“संकीर्तन करते समय पहले कहते हैं, ‘निताई आमार माता हाथी!’ ‘निताई आमार माता हाथी!’ (मेरा निताई मतवाले हाथी की तरह नाच रहा है) भाव गहरा होने पर सिर्फ ‘हाथी हाथी’ कहते हैं। इसके बाद केवल ‘हाथी’ शब्द मुँह में लगा रहता है। अन्त को ‘हा’ कहते हुए भाव-समाधि होती है। तब वे जो अब तक कीर्तन कर रहे थे, चुप हो जाते हैं।
“जैसे ब्रह्मभोज में पहले खूब शोरगुल मचता है। जब सभी के आगे पत्तल पड़ जाती है तब गुलगपाड़ा बहुत-कुछ घट जाता है। केवल ‘पूड़ी लाओ, पूड़ी लाओ’ की आवाज होती रहती है। फिर जब लोग पूड़ी-तरकारी खाना शुरू करते हैं तब बारह आना शब्द घट जाता है। जब दही आया तब सप्-सप् (सब हँसते हैं।) – शब्द मानो होता ही नहीं। और भोजन के बाद निद्रा। तब सब चुप!
“इसीलिए कहा कि पहले-पहल कामों की बड़ी रेलपेल रहती है। ईश्वर के रास्ते पर जितना बढ़ोगे उतने ही कर्म घटते जायेंगे। अन्त को कर्म छूट जाते हैं। और समाधि होती है।
“गृहस्थ की बहू के गर्भवती होने पर उसकी सास काम घटा देती है। दसवें महीने में काम अक्सर नहीं करना पड़ता। लड़का होने पर उसका काम बिलकुल छूट जाता है। फिर वह सिर्फ लड़के की देखभाल में रहती है। घर-गृहस्थी का काम सास, ननद, जेठानी ये ही सब करती हैं।
समाधि के बाद लोकशिक्षा
“समाधिस्थ होने के बाद प्रायः शरीर नहीं रहता। किसी किसी का शरीर लोक-शिक्षण के लिए रह जाता है, – जैसे नारदादिकों का और चैतन्य जैसे अवतारपुरुषों का। कुआँ खुद जाने पर कोई कोई झौवा कुदाल फेंक देते हैं। कोई कोई रख लेते हैं, – सोचते हैं, शायद पड़ोस में किसी दूसरे को जरूरत पड़े। इसी प्रकार महापुरुष जीवों का दुःख देखकर विकल हो जाते हैं। ये स्वार्थी नहीं होते कि अपने ही ज्ञान से मतलब रखें। स्वार्थी लोगों की कथा तो जानते हो। कटी उँगली पर भी नहीं मूतते कि कहीं दूसरे का उपकार न हो जाय। (सब हँसे।) एक पैसे की बर्फी दूकान से ले आने को कहो तो उसमें से भी