श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ अक्टूबर, १८८२
ईश्वरलाभ के लक्षण – सप्तभूमि तथा ब्रह्मज्ञान
“वेदों में ब्रह्मज्ञानी की अनेक प्रकार की अवस्थाओं का वर्णन है। ज्ञानमार्ग बड़ा कठिन मार्ग है। विषय-वासना – कामिनी-कांचन के प्रति आसक्ति – का लेशमात्र रहते ज्ञान नहीं होता। यह पथ कलिकाल में साधन करने योग्य नहीं।
“इस विषय में वेदों में सप्तभूमि (Seven Planes) का उल्लेख है। मन इन सात सोपानों पर विचरण किया करता है। जब वह संसार में रहता है तब लिंग, गुदा और नाभि उसके निवासस्थल हैं। तब वह उन्नत दशा पर नहीं रहता – केवल कामिनी-कांचन में लगा रहता है। मन की चौथी भूमि है हृदय। तब चैतन्य का उदय होता है, और मनुष्य को चारों ओर ज्योति दिखलायी पड़ती है। तब वह मनुष्य ईश्वरी ज्योति देखकर सविस्मय कह उठता है, ‘यह क्या है, यह क्या है!’ तब फिर नीचे (संसार की ओर) मन नहीं मुड़ता।
“मन की पंचम भूमि है कण्ठ। जिसका मन कण्ठ तक पहुँचा है उसकी सारी अविद्या, सम्पूर्ण अज्ञान दूर हो गया है। ईश्वरी प्रसंग के सिवा और कोई बात न तो सुनने को और न कहने को उसका जी चाहता है। यदि कोई व्यक्ति दूसरी चर्चा छेड़ता है तो वह वहाँ से उठ जाता है।
“मन की छठी भूमि कपाल है। मन वहाँ जाने से दिनरात ईश्वरी रूप के दर्शन होते हैं। उस समय भी कुछ ‘मैं’ रहता है। वह मनुष्य उस अनुपम रूप को देखकर मतवाले की तरह उसे छूने तथा गले लगाने को बढ़ता है, परन्तु पाता नहीं। जैसे लालटेन के भीतर बत्ती को जलते देखकर, मन में आता है कि छूना चाहें तो हम इसे छू सकते हैं, परन्तु काँच के आवरण के कारण हम उसे छू नहीं पाते।
“शिरोदेश सप्तम भूमि है। वहाँ मन जाने से समाधि होती है और ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म का प्रत्यक्ष दर्शन करता है। परन्तु उस अवस्था में शरीर अधिक दिन नहीं रहता है। सदा बेहोश, कुछ खाया नहीं जाता, मुँह में दूध डालने से भी गिर जाता है। इस भूमि में रहने से इक्कीस दिन के भीतर मृत्यु होती है। यही ब्रह्मज्ञानियों की अवस्था है। तुम लोगों के लिए भक्तिपथ है। भक्तिपथ बड़ा अच्छा और सहज है।
समाधि होनेपर कर्मत्याग – पूर्वकथा – श्रीरामकृष्ण का तर्पणादि कर्मत्याग
“मुझसे एक मनुष्य ने कहा था, ‘महाराज, मुझे आप समाधि सिखा सकते हैं?’ (सब हँसते हैं।)
“समाधि होने पर सब कर्म छूट जाते हैं। पूजा-जपादि कर्म, विषय-कर्म सब छूट जाते हैं। पहले-पहल कामों की बड़ी रेलपेल होती है, परन्तु ईश्वर की ओर जितना ही बढ़ोगे, कामों का आडम्बर उतना ही घटता जाएगा; यहाँ तक कि नामगुणकीर्तन तक छूट जाता है। (शिवनाथ से) जब तक तुम सभा में नहीं आए कि तब तक तुम्हारे नाम और गुणों