भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 126

२८ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १४ | १०३

लोग केवल वादविवाद करके कष्ट उठाते हैं। कबीर कहते थे, – 'निराकार मेरा पिता है और साकार मेरी माँ।'

"भक्त को जो स्वरूप प्यारा है, उसी रूप से वे दर्शन देते हैं – वे भक्तवत्सल हैं न। पुराण में कहा है कि वीरभक्त हनुमान के लिए उन्होंने रामरूप धारण किया था।

कालीरूप तथा श्यामरूप की व्याख्या

"वेदान्त-विचार के सामने नाम-रूप कुछ नहीं ठहरते। उस विचार का चरम सिद्धान्त है – 'ब्रह्म सत्य और नामरूपोंवाला संसार मिथ्या।' जब तक 'मैं भक्त हूँ' यह अभिमान रहता है, तभी तक ईश्वर का रूप दिखायी देना और ईश्वर के सम्बन्ध में व्यक्ति (Person) का बोध रहना सम्भव है। विचार की दृष्टि से देखें तो भक्त के 'मैं भक्त हूँ' इस अभिमान ने उसे कुछ दूर कर रखा है।

"कालीरूप या श्यामरूप साढ़ेतीन हाथ का इसलिए है कि वह दूर है। दूर होने ही के कारण सूर्य छोटा दिखता है। पास जाओ तो इतना बड़ा मालूम होगा कि उसकी धारणा ही न कर सकोगे। और फिर कालीरूप या श्यामरूप श्यामवर्ण क्यों है? – क्योंकि वह भी दूर है। सरोवर का जल दूर से हरा, नीला या काला दीख पड़ता है; निकट जाकर हाथ में लेकर देखो, कोई रंग नहीं। आकाश दूर ही से नीला दिखायी देता है, पास जाकर देखो तो कोई रंग नहीं।

"इसलिए कहता हूँ, वेदान्त-दर्शन के विचार से ब्रह्म निर्गुण है। उनका स्वरूप क्या है, यह मुँह से नहीं कहा जा सकता। परन्तु जब तक तुम स्वयं सत्य हो तब तक संसार भी सत्य है, ईश्वर के नामरूप भी सत्य हैं, ईश्वर को एक व्यक्ति समझना भी सत्य है।

"तुम्हारा मार्ग भक्तिमार्ग है। यह बड़ा अच्छा है, सरल मार्ग है। अनन्त ईश्वर समझ में थोड़े ही आ सकते हैं? और उन्हें समझने की जरूरत भी क्या? यह दुर्लभ मनुष्यजन्म प्राप्त कर हमें वह करना चाहिए जिससे उनके चरण-कमलों में भक्ति हो।

"यदि लोटेभर पानी से हमारी प्यास बुझे तो तालाब में कितना पानी है, इसकी नापतौल करने की क्या जरूरत? अगर अद्धेभर शराब से हम मस्त हो जायें तो कलवार की दूकान में कितने मन शराब है, इसकी जाँच-पड़ताल करने का क्या काम? अनन्त का ज्ञान प्राप्त करने का क्या प्रयोजन?

(६)

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥ (गीता, ३।१७)