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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२८ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १४ १०१

भक्तों के पास वे व्यक्तभाव से कभी कभी साकाररूप धारण करते हैं। ज्ञान-सूर्य का उदय होने पर वह बर्फ गल जाती है, तब ईश्वर के व्यक्तित्व का बोध नहीं रह जाता – उनका रूप भी नहीं दिखायी देता। वे क्या हैं, मुँह, से नहीं कहा जा सकता। कहे कौन! जो कहेंगे वे ही नहीं रह गए, उनका 'मैं' ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता।

"विचार करते करते फिर 'मैं' नहीं रह जाता। जब तुम प्याज छीलते हो, तब पहले लाल छिलके निकलते हैं। फिर सफेद मोटे छिलके। इसी तरह लगातार छीलते जाओ तो भीतर ढूँढ़ने से कुछ नहीं मिलता।

"जहाँ अपना 'मैं' खोजे नहीं मिलता – और खोजे भी कौन? – वहाँ ब्रह्म के स्वरूप का बोध किस प्रकार होता है, यह कौन कहे! नमक का एक पुतला समुद्र की थाह लेने गया। समुद्र में ज्योंही उतरा कि गलकर पानी हो गया। फिर खबर कौन दे?

"पूर्ण ज्ञान का लक्षण यह है, – पूर्ण ज्ञान होने पर मनुष्य चुप हो जाता है। तब 'मैं' रूपी नमक का पुतला सच्चिदानन्दरूपी समुद्र में गलकर एक हो जाता है, फिर जरा भी भेदबुद्धि नहीं रह जाती।

"विचार करने का जब तक अन्त नहीं होता, तब तक लोग तर्क पर तुले रहते हैं। अन्त हुआ कि चुप हो गए। घड़ा भर जाने से – घड़े का जल और तालाब का जल एक हो जाने से – फिर शब्द नहीं होता। जब तक घड़ा भर नहीं जाता, शब्द तभी तक होता है।

"पहले के लोग कहते थे, काले पानी में जहाज जाने से फिर लौट नहीं सकता।

मैं पन नहीं जा सकता

" 'मैं' मरा कि बला टली। (हास्य) विचार चाहे लाख करो पर 'मैं' दूर नहीं होता। तुम्हारे और हमारे लिए 'मैं भक्त हूँ' यह अभिमान अच्छा है।

"भक्तों के लिए सगुण ब्रह्म हैं अर्थात् वे सगुण अर्थात् मनुष्य के रूप में दर्शन देते हैं। प्रार्थनाओं के सुननेवाले वे ही हैं। तुम लोग जो प्रार्थना करते हो वह उन्हीं से करते हो। तुम लोग न वेदान्तवादी हो, न ज्ञानी; तुम लोग भक्त हो। साकार रूप मानो चाहे न मानो, इसमें कुछ हानि नहीं; केवल यह ज्ञान रहने ही से काम होगा कि ईश्वर एक वह व्यक्ति हैं जो प्रार्थनाओं को सुनते हैं, सृजन, पालन और प्रलय करते हैं, जिनमें अनन्त शक्ति है।

"भक्तिमार्ग से ही वे जल्दी मिलते हैं।"

(५)

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।। (गीता, ११।५४)