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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१००श्रीरामकृष्णवचनामृत२८ अक्टूबर, १८८२
  • उनके ऐश्वर्य का अधिकारी हूँ!” इस प्रकार की जिद चाहिए।

“तमोगुण को ईश्वर की ओर फेर देने से ईश्वर-लाभ होता है। उनसे हठ करो; वे कोई दूसरे तो नहीं, अपने ही तो हैं।

“फिर देखो, यह तमोगुण दूसरों के हित पर लगाया जा सकता है। वैद्य तीन प्रकार के होते हैं; – उत्तम, मध्यम और अधम। जो वैद्य नाड़ी देखकर ‘दवा खा लेना’ कहकर चला जाता है, वह अधम वैद्य है। रोगी ने दवा खाई या नहीं, इसकी खबर वह नहीं लेता। जो वैद्य रोगी को दवा खाने के लिए तरह तरह से समझाता बुझाता है, मीठी बातों से कहता है, ‘अजी दवा नहीं खाओगे तो अच्छे किस तरह होगे! भैया, खा लो, अच्छा मैं खुद खरल करके खिलाता हूँ’, वह मध्यम वैद्य है और जो वैद्य रोगी को किसी तरह दवा न खाते हुए देखकर छाती पर चढ़ बैठ जबरदस्ती दवा खिलाता है, वह उत्तम वैद्य है। यह वैद्यों का तमोगुण है, इस गुण से रोगी का उपकार होता है, अपकार नहीं।

तीन प्रकार के आचार्य

“वैद्यों के समान तीन प्रकार के आचार्य भी हैं। धर्मोपदेश देकर जो शिष्यों की फिर कोई खबर नहीं लेते वे आचार्य अधम हैं। जो शिष्यों के हित के लिए बार बार उन्हें समझाते हैं जिससे कि वे उपदेशों की धारणा कर सकें, बहुत विनय-प्रार्थना करते हैं, प्यार करते हैं, – वे मध्यम आचार्य हैं। और जब शिष्यों को किसी तरह उपदेश न सुनते देख कोई कोई आचार्य बलपूर्वक उन्हें राह पर लाते हैं, तो उन्हें उत्तम आचार्य समझना चाहिए।”

(४)

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। (तैत्तिरीय उपनिषत् २/४)

ब्रह्म का स्वरूप अनिर्वचनीय है

एक ब्राह्मभक्त ने पूछा – ईश्वर साकार हैं या निराकार ?

श्रीरामकृष्ण – उनकी इति नहीं की जा सकती। वे निराकार हैं, फिर साकार भी हैं। भक्तों के लिए वे साकार हैं। जो ज्ञानी हैं – संसार को जिन्होंने स्वप्नवत् मान लिया है, उनके लिए वे निराकार हैं। भक्त का यह विश्वास है कि मैं एक पृथक् सत्ता हूँ तथा संसार एक पृथक सत्ता; इसलिए भक्त के निकट ईश्वर ‘व्यक्ति’ (Personal God) के रूप में आते हैं। ज्ञानी – जैसे वेदान्तवादी – सिर्फ ‘नेति नेति’ विचार करता है। विचार करने पर उसे यह बोध होता है कि मैं मिथ्या हूँ, संसार भी मिथ्या – स्वप्नवत् है। ज्ञानी ब्रह्म को बोधरूप देखता है परन्तु वे क्या हैं, यह मुँह से नहीं कह सकता।

“वे किस तरह हैं, जानते हो ? मानो सच्चिदानन्द समुद्र है जिसका ओर-छोर नहीं।


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