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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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९२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२

“लोकशिक्षा देना हो तो चपरास चाहिए। नहीं तो वह हास्यास्पद बात हो जाती है। खुद को ही नहीं मिली, दूसरों को देने चला। एक अन्धा दूसरे अन्धे को राह बताते हुए ले चला है। (हास्य) इससे हित होने के बजाय विपरीत ही होता है। ईश्वरलाभ होने पर अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है, उसी समय किसे कौनसा रोग है यह समझ में आता है, योग्य उपदेश दिया जा सकता है।

‘‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहं इति मन्यते’’

‘‘आदेश न मिलने पर ‘मैं लोगों को शिक्षा दे रहा हूँ’ इस प्रकार का अहंकार होता है। अहंकार होता है अज्ञान के कारण। अज्ञान से ऐसा लगता है कि मैं कर्ता हूँ। ईश्वर ही कर्ता हैं, ईश्वर सब कुछ कर रहे हैं, मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ – यह बोध हो जाने पर तो मनुष्य जीवन्मुक्त हो गया। ‘मैं कर्ता हूँ’ इस बोध के कारण ही इतना दुःख, इतनी अशान्ति पैदा होती है।

(९)

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः।। ३।१९

केशवादि ब्राह्मभक्तों को कर्मयोगसम्बन्धी उपदेश

श्रीरामकृष्ण (केशवादि से) – तुम लोग ‘दुनिया का भला’ करने की बातें करते हो। क्या दुनिया इतनी छोटी है और तुम कौन हो दुनिया का भला करनेवाले ? साधना के द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार कर लो, उनका लाभ कर लो। वे यदि शक्ति दें तो सब का हित कर सकोगे, अन्यथा नहीं।

एक भक्त – जब तक ईश्वरलाभ न हो जाय तब तक क्या सब कर्म त्याग दें ?

श्रीरामकृष्ण – नहीं, कर्मों का त्याग क्यों करोगे ? ईश्वर का चिन्तन, उनका नामगुणगान, नित्यकर्म – यह सब करना पड़ेगा।

ब्राह्मभक्त – संसार का कर्म ? वैषयिक कर्म ?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, वह भी करो, संसारयात्रा के निर्वाह के लिए जितना आवश्यक हो उतना ही। परन्तु निर्जन में रो-रोकर ईश्वर से प्रार्थना करनी होगी, ताकि इन कर्मों को निष्काम भाव से किया जा सके। कहो, ‘हे ईश्वर, मेरे विषय-कर्म कम कर दो, क्योंकि प्रभो, मैं देख रहा हूँ कि ज्यादा कामकाज के आ पड़ने से मैं तुम्हें भूल जाता हूँ। सोचता हूँ कि मैं निष्काम कर्म कर रहा हूँ पर वह सकाम हो जाता है।’ दान-धर्म आदि अधिक करने गए कि नाम कमाने की इच्छा आ जाती है।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar