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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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९४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२

पूछा, “कौन कौन साथ जा रहे हैं?” गाड़ी में सब के बैठ जाने पर केशव ने भूमिष्ठ होकर श्रीरामकृष्ण की पदधूलि ग्रहण की। श्रीरामकृष्ण ने भी स्नेहपूर्ण शब्दों में विदा ली।

गाड़ी चलने लगी। यह अंग्रेजों का मुहल्ला है। सुन्दर राजमार्ग है। दोनों ओर सुन्दर सुन्दर इमारतें हैं। पूर्णचन्द्र उदित हुआ है; इमारतें मानो चन्द्र की विमल, शीतल किरणों में विश्राम कर रही हैं। दरवाजों पर गैसबत्तियाँ, कमरों के भीतर दीपमालाएँ जगमगा रही हैं। जगह जगह पर हारमोनियम-पियानो के साथ अंग्रेज महिलाएँ गा रही हैं। श्रीरामकृष्ण आनन्द से मृदु हास्य करते हुए जा रहे हैं। एक जगह एकाएक बोल उठे, “मुझे प्यास लग रही है, क्या किया जाय?” नन्दलाल ने इण्डिया क्लब के पास गाड़ी रुकवायी और ऊपर जाकर काँच के गिलास में पानी ले आए। श्रीरामकृष्ण ने मुसकराते हुए पूछा, “गिलास धोया है न?” नन्दलाल के “हाँ” कहने पर श्रीरामकृष्ण ने उस गिलास का पानी पी लिया।

आपका बालक जैसा स्वभाव है। गाड़ी के चलने लगते ही बाहर झाँककर आसपास के मनुष्य, गाड़ी-घोड़े, चाँदनी आदि देखने लगे। हर एक बात में आनन्दित हो रहे हैं।

नन्दलाल कलुटोला में उतरे। श्रीरामकृष्ण की गाड़ी सिमुलिया स्ट्रीट में श्री सुरेश मित्र के मकान के सामने आ पहुँची। श्रीरामकृष्ण इन्हें सुरेन्द्र कहा करते थे। सुरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के परम भक्त हैं।

परन्तु सुरेन्द्र घर में नहीं हैं। अपने नये बगीचे में गए हैं। घर के लोगों ने बैठने के लिए नीचे का कमरा खोल दिया। गाड़ी का किराया देना होगा। कौन देगा ? अगर सुरेन्द्र होते तो वे ही देते। श्रीरामकृष्ण ने एक भक्त से कहा, “किराया घर की स्त्रियों से माँग लो न! क्या वे नहीं जानतीं कि उनके पति वहाँ आया-जाया करते हैं?” (सब हँसते हैं।)

नरेन्द्र उसी मुहल्ले में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र को बुला लाने कहा। घरवालों ने श्रीरामकृष्ण को दूसरे मंजले पर ले जाकर बैठाया। कमरे की फर्श पर बिछायत बिछी हुई है, उस पर दो-चार तकिये रखे हैं। दीवार पर सुरेन्द्र के द्वारा विशेष प्रयत्नपूर्वक बनवावाया हुआ तैलचित्र है, जिसमें श्रीरामकृष्ण केशव को हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध आदि सब धर्म तथा वैष्णव, शाक्त, शैव आदि सब सम्प्रदायों का समन्वय दिखला रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण प्रसन्न बैठकर मुसकराते हुए बातचीत कर रहे हैं। इतने में नरेन्द्र आ पहुँचे। अब तो श्रीरामकृष्ण का आनन्द मानो द्विगुणित हो उठा। आपने कहा, “आज केशव सेन के साथ जहाज में बैठकर घूमने गया था। विजय था, ये सब लोग थे।” मास्टर को निर्देशित करते हुए कहा, “इनसे पूछो, विजय और केशव को मैंने कैसे माँ-बेटी का मंगलवार, जटिला-कुटिला के बिना लीला की पुष्टि नहीं होती – ये सब बातें कहीं। (मास्टर से) क्यों जी?”

मास्टर – जी हाँ।

रात हो गयी पर अब भी सुरेन्द्र नहीं लौटे। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर जाएँगे, अब