श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 159, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
१३६ श्रीरामकृष्णवचनामृत
वार्तालाप के भीतर से उपदेश दे रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण - देखो, व्यापार करने में सत्य की टेक नहीं रहती। व्यापार में तेजी-मन्दी होती रहती है। नानक की कहानी में है, उन्होंने कहा, "असाधु की चीजें खाने गया तो मैंने देखा कि वे सब खून से लथपथ हो गयी हैं!' साधु को शुद्ध चीज देनी चाहिए। मिथ्या उपाय से प्राप्त की हुई चीजें नहीं देनी चाहिए। सत्यपथ द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।'*
"सदा उनका नाम लेना चाहिए। काम के समय मन को उनके हवाले कर देना चाहिए। जिस प्रकार मेरी पीठ पर फोड़ा हुआ है, सभी काम कर रहा हूँ, परन्तु मन फोड़े में ही है। रामनाम लेना अच्छा है। जो राम दशरथ का बेटा है, उन्होंने जगत् की सृष्टि की है, वे सर्वभूतों में हैं। और वे अत्यन्त निकट हैं, वे ही भीतर और बाहर हैं।
“वही राम दशरथ का बेटा, वही राम घट-घट में लेटा। वही राम जगत् पसेरा वही राम सब से न्यारा।।”
* सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यक् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्। (मुण्डकोपनिषद् ३।१।५) सत्यमेव जयते नानृतम्। - (मुण्डकोपनिषद्, ३।१।६)
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar