श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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परिच्छेद २२
राखाल. प्राणकृष्ण, केदार आदि भक्तों के साथ
(१)
समाधि में
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के अपने कमरे में भक्तों के साथ बैठे हैं। दिनरात भगवत्प्रेम में – ब्रह्ममयी माता के प्रेम में – मस्त रहते हैं।
फर्श पर चटाई बिछी है। आप उसी पर आकर बैठ गए। सामने हैं प्राणकृष्ण और मास्टर। श्री राखाल* भी कमरे में बैठे हुए हैं। हाजरा महाशय घर के बाहर दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में बैठे हुए हैं।
जाड़े का मौसम है – पूस का महीना। सोमवार, दिन के आठ बजे हैं। पहली जनवरी १८८३। श्रीरामकृष्ण शाल ओढ़े हुए हैं।
इस समय श्रीरामकृष्ण के अनेक अन्तरंग भक्त आने-जाने लगे हैं। लगभग सालभर से नरेन्द्र, राखाल, भवनाथ, बलराम, मास्टर, बाबूराम, लाटू आदि भक्त सदा आते-जाते रहते हैं। इनके आने के सालभर पूर्व से राम, मनोमोहन, सुरेन्द्र और केदार आया करते हैं।
लगभग पाँच महीने हुए होंगे, जब श्रीरामकृष्ण विद्यासागर के ‘बादुड़बागान’ वाले मकान में पधारे थे। दो महीने पूर्व आप श्री केशव सेन के साथ विजय आदि ब्राह्मभक्तों को लेकर नाव पर आनन्द करते हुए कलकत्ता गए थे।
श्री प्राणकृष्ण मुखोपाध्याय कलकत्ते के श्यामपुकुर मुहल्ले में रहते हैं। पहले इनका जनाई मौजे में निवास था। ये ‘एक्सचेंज’ विभाग के बड़े बाबू हैं। नीलाम के काम की देखरेख करते हैं। पहली पत्नी के कोई सन्तान न होने के कारण उनकी सम्मति से उन्होंने दूसरी बार विवाह किया था। दूसरी पत्नी के एक पुत्र हुआ है। वही इनकी इकलौती सन्तान है। श्रीरामकृष्ण पर इनकी बड़ी भक्ति है। शरीर कुछ स्थूल होने के कारण कभी कभी
* इन्हें श्रीरामकृष्ण की अभीष्टदेवी काली ने श्रीरामकृष्ण को उनका मानस पुत्र बतलाया था; ये ही बाद में स्वामी ब्रह्मानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए और रामकृष्ण संघ के प्रथम संचालक हुए थे।
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