श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १३८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १ जनवरी, १८८३ |
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श्रीरामकृष्ण इन्हें ‘मोटा ब्राह्मण’ कहकर पुकारते थे। ये बड़े सज्जन व्यक्ति हैं। लगभग नौ महीने हुए होंगे, श्रीरामकृष्ण ने भक्तों के साथ इनका निमन्त्रण स्वीकार किया था। इन्होंने बड़े आदर से सब को भोजन कराया था।
श्रीरामकृष्ण जमीन पर बैठे हुए हैं। पास ही टोकरीभर जलेबियाँ रखी हैं – किसी भक्त ने लायी हैं। आपने जलेबी का एक टुकड़ा तोड़कर खाया।
श्रीरामकृष्ण (प्राणकृष्ण आदि से हँसते हुए) – देखा, मैं माता का नाम जपता हूँ, इसीलिए ये सब चीजें खाने को मिलती हैं। (हास्य)
“परन्तु वे लौकी-कोहड़े जैसे फल नहीं देती – वे देतीं हैं अमृतफल – ज्ञान, प्रेम, विवेक, वैराग्य!”
कमरे में छः-सात साल की उम्र का एक लड़का आया। इधर श्रीरामकृष्ण की भी बालकों जैसी अवस्था है। जैसे एक बालक किसी दूसरे बालक को देखकर खाने की चीज छिपा लेता है जिससे वह छीनाझपटी न करे, वैसे ही श्रीरामकृष्ण की अवस्था उस बालक को देखकर होने लगी। वे उस जलेबियों की टोकरी को हाथों से ढककर छिपाने लगे। फिर धीरे से उन्होंने उसे एक ओर हटाकर रख दिया।
प्राणकृष्ण गृहस्थ तो हैं परन्तु वे वेदान्तचर्चा भी करते हैं, कहते हैं, “ब्रह्म ही सत्य है, संसार मिथ्या; मैं वही हूँ – सोऽहम्।” श्रीरामकृष्ण उन्हें समझाते हैं – “कलिकाल में प्राण अन्नगत है, कलिकाल में नारदीय भक्ति चाहिए।
“वह विषय भाव का है, बिना भाव के कौन उसे पा सकता है?”
बालकों की तरह हाथों से जलेबियों की टोकरी छिपाते हुए श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये।
(२)
भावराज्य व रूपदर्शन
श्रीरामकृष्ण समाधि में मग्न हैं। काफी समय हुआ, भाव के आवेश में पूर्ण बने बैठे हैं। न देह डुलती है, न पलकें गिरती हैं; साँस भी चलती है या नहीं, जान नहीं पड़ता।
बड़ी देर बाद आपने एक लम्बी साँस छोड़ी – मानो इन्द्रियराज्य में फिर लौट रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (प्राणकृष्ण से) – वे केवल निराकार नहीं, साकार भी हैं। उनके रूप के दर्शन होते हैं। भाव और भक्ति से उनके अनुपम रूप के दर्शन मिलते हैं। माँ अनेक रूपों में दर्शन देती हैं।
“कल माँ को देखा, गेरुए रंग का अँगरखा पहने हुए। मेरे साथ बातें कर रही थीं।
“और एक दिन मुसलमान लड़की के रूप में मेरे पास आयी थीं। कपाल पर