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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 163
१४०श्रीरामकृष्णवचनामृत१ जनवरी, १८८३

साधनी ही पड़ी।

“पहले प्रत्यक्ष दर्शन होते थे – इन्हीं आँखों से, जैसे तुम्हें देख रहा हूँ। अब भावावेश में दर्शन होते हैं।

“ईश्वर-लाभ होने पर बालकों का-सा स्वभाव हो जाता है। जो जिसका चिन्तन करता है, वह उसकी सत्ता को भी पाता है। ईश्वर का स्वभाव बालकों जैसा है। खेलते हुए बालक जैसे घरौंदा बनाते, बिगाड़ते और उसे फिर से बनाते हैं, उसी तरह वे भी सृष्टि, स्थिति और प्रलय कर रहे हैं। बालक जैसे किसी गुण के वश में नहीं है, उसी प्रकार वे भी सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हैं।

“इसीलिए जो परमहंस होते हैं, वे दस-पाँच बालक अपने साथ रखते हैं – अपने पर उनके स्वभाव का आरोप करने के लिए।”

आगरपाड़ा से एक बीस-बाईस साल का लड़का आया हुआ है। जब यह आया है, श्रीरामकृष्ण को इशारा करके एकान्त में ले जाता है और वहीं चुपचाप अपने मन की बात कहता है। यह अभी हाल ही में आने-जाने लगा है। आज वह निकट आकर फर्श पर बैठा।

प्रकृतिभाव तथा कामजय। सरलता और ईश्वरलाभ

श्रीरामकृष्ण (उसी लड़के से) – आरोप करने पर भाव बदल जाता है। प्रकृति के भाव का आरोप करो तो धीरे धीरे कामादि रिपु नष्ट हो जाते हैं। ठीक स्त्रियों के-से हाव-भाव हो जाते हैं। नाटक में जो लोग स्त्रियों का काम करते हैं, उन्हें नहाते समय देखा है, – स्त्रियों की ही तरह दाँत माँजते और बातचीत करते हैं।

“तुम किसी शनिवार या मंगलवार को आओ।”

(प्राणकृष्ण से) – “ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं। शक्ति न मानो तो संसार मिथ्या हो जाता है; हम, तुम, घर, परिवार – सब मिथ्या हो जाते हैं। आद्याशक्ति के रहने ही के कारण संसार का अस्तित्व है। बिना आधार के कोई चीज कभी ठहर सकती है? बिना खूँटियों के न तो ढाँचा खड़ा रह सकता है और न उस पर सुन्दर मूर्ति ही बन सकती है।

“विषयबुद्धि का त्याग किये बिना चैतन्य नहीं होता है – ईश्वर नहीं मिलते। उसके रहने ही से कपटता आ जाती है। बिना सरल हुए कोई उन्हें पा नहीं सकता।

‘ऐसी भक्ति करो घट भीतर, छोड़ कपट चतुराई।
सेवा बन्दी और अधीनता, सहज मिलें रघुराई।।’

“जो लोग विषयकर्म करते हैं, आफिस का काम या व्यवसाय करते हैं, उन्हें भी सच्चाई से रहना चाहिए। सच बोलना कलिकाल की तपस्या है।

प्राणकृष्ण –

“अस्मिन् धर्मे महेशि स्यात् सत्यवादी जितेन्द्रियः।
परोपकारनिरतो निर्विकारः सदाशयः।।”