श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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परिच्छेद २५
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर के अपने कमरे में राखाल, मास्टर आदि दो-एक भक्तों के साथ बैठे हैं। शुक्रवार, ९ मार्च १८८३ ई.। माघी अमावस्या, प्रातःकाल आठ-नौ बजे का समय होगा।
अमावस्या का दिन है। श्रीरामकृष्ण को सतत जगन्माता का उद्दीपन हो रहा है। वे कह रहे हैं, “ईश्वर ही वस्तु हैं, बाकी सब अवस्तु। माँ ने अपनी महामाया द्वारा मुग्ध कर रखा है। मनुष्यों में देखो, बद्ध जीव ही अधिक हैं। इतना दुःख-कष्ट पाते हैं, फिर भी उसी ‘कामिनी-कांचन’ में उनकी आसक्ति है। काँटेदार घास खाते समय ऊँट के मुँह से धर-धर खून बहता है, फिर भी वह उसे छोड़ता नहीं, खाते ही जाता है। प्रसववेदना के समय स्त्रियाँ कहती हैं, ‘ओह, अब और पति के पास नहीं जाऊँगी’, परन्तु फिर भूल जाती हैं।
“देखो, उनकी खोज कोई नहीं करता। अनन्नास को छोड़ लोग उसके पत्ते खाते हैं!”
संसार किसलिए? निष्काम कर्म द्वारा चित्तशुद्धि के लिए
भक्त – महाराज, संसार में वे क्यों रख देते हैं?
श्रीरामकृष्ण – संसार कर्मक्षेत्र है। कर्म करते करते ही ज्ञान होता है। गुरु ने कहा, इन कर्मों को करो और इन कर्मों को न करो। फिर वे निष्काम कर्म का उपदेश देते हैं।* कर्म करते करते मन का मैल धुल जाता है। अच्छे डाक्टर की चिकित्सा में रहने पर दवा खाते खाते कैसा ही रोग क्यों न हो, ठीक हो जाता है।
“संसार से वे क्यों नहीं छोड़ते? रोग अच्छा होगा तब छोड़ेंगे। कामिनी-कांचन का भोग करने की इच्छा जब न रहेगी, तब छोड़ेंगे। अस्पताल में नाम लिखाकर भाग आने का उपाय नहीं है। रोग की कसर रहते डाक्टर साहब न छोड़ेंगे।”
श्रीरामकृष्ण आजकल यशोदा की तरह सदा वात्सल्य-रस में मग्न रहते हैं, इसलिए उन्होंने राखाल को साथ रखा है। राखाल के प्रति श्रीरामकृष्ण का गोपाल-भाव है। जिस
* कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (गीता, २।४७)
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