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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२५ फरवरी, १८८३ परिच्छेद २४ १५१

“बाहर शैव, हृदय में काली, मुख में हरिनाम।

“कुछ कुछ काम-क्रोधादि के न रहने से शरीर नहीं रहता। परन्तु तुम लोग घटाने ही की चेष्टा करना।”

श्रीरामकृष्ण केदार को देखकर कह रहे हैं -

“ये अच्छे हैं। नित्य भी मानते हैं, लीला भी मानते हैं। एक ओर ब्रह्म और दूसरी ओर देवलीला से लेकर मनुष्यलीला तक!”

केदार कहते हैं कि श्रीरामकृष्ण के रूप में भगवान् मनुष्यदेह धारण कर अवतीर्ण हुए हैं।

संन्यासी तथा कामिनी

नित्यगोपाल को देखकर श्रीरामकृष्ण बोले -

“इसकी अच्छी अवस्था है। (नित्यगोपाल से) तू वहाँ ज्यादा न जाना। कहीं एक-आध बार चले गए। भक्त है तो क्या हुआ – स्त्री है न? इसीलिए सावधान रहना।

“संन्यासी के नियम बड़े कठिन हैं। उसके लिए स्त्रियों के चित्र देखने की भी मनाही है। यह संसारियों के लिए नहीं है।

“स्त्री यदि भक्त भी हो तो भी उससे ज्यादा न मिलना चाहिए।

“जितेन्द्रिय होने पर भी संन्यासी को लोकशिक्षा के लिए यह सब करना पड़ता है।

“साधुपुरुष का सोलहों आना त्याग देखने पर दूसरे लोग त्याग की शिक्षा लेंगे, नहीं तो वे भी डूब जायेंगे। संन्यासी जगद्गुरु हैं।”

अब श्रीरामकृष्ण और भक्तगण उठकर घूमने लगे। मास्टर प्रह्लाद के चित्र के सामने खड़े होकर देख रहे हैं – श्रीरामकृष्ण ने कहा है कि प्रह्लाद की भक्ति अहैतुकी भक्ति है।