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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद ४६

भक्तों के साथ

(१)

कलकत्ते की राह पर

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर से गाड़ी पर कलकत्ते की ओर जा रहे हैं। साथ में रामलाल और दो-एक भक्त हैं। फाटक से निकलते ही आपने देखा कि मणि हाथ में चार फजली आम लिए हुए पैदल आ रहे हैं। मणि को देखकर गाड़ी को रोकने के लिए कहा। मणि ने गाड़ी पर सिर टेककर प्रणाम किया।

आज शनिवार, २१ जुलाई १८८३ ई., आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा है। दिन के चार बजे हैं। श्रीरामकृष्ण अधर के मकान पर जाएँगे, उसके बाद यदु मल्लिक के घर और फिर खेलात घोष के यहाँ जाएँगे।

श्रीरामकृष्ण (मणि से हँसते हुए) – तुम भी आओ न, हम अधर के यहाँ जा रहे हैं।

मणि – 'जैसी आपकी आज्ञा' कहकर गाड़ी पर बैठ गये।

मणि – अंग्रेजी पढ़े-लिखे हैं, इसी से संस्कार नहीं मानते थे पर कुछ दिन हुए श्रीरामकृष्ण के पास यह स्वीकार कर गए थे कि अधर के संस्कार थे, इसी से वे उनकी इतनी भक्ति करते हैं। घर लौटकर विचार करने पर मास्टर ने देखा कि संस्कार के बारे में अभी तक उनको पूर्ण विश्वास नहीं हुआ। यही कहने के लिए आज श्रीरामकृष्ण से मिलने आए हैं। श्रीरामकृष्ण बातें करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, अधर को तुम कैसा समझते हो?

मणि – उनमें बहुत अनुराग है।

श्रीरामकृष्ण – अधर भी तुम्हारी बड़ी प्रशंसा करता है।

मणि – कुछ देर तक चुप रहे, फिर पूर्वजन्म के संस्कार की बात उठायी।

ईश्वर के कार्य समझना असम्भव है

मणि – मुझे 'पूर्वजन्म' और 'संस्कार' आदि पर उतना विश्वास नहीं है; क्या इससे मेरी भक्ति में कोई बाधा आएगी?

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar