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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२७६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २२ जुलाई, १८८३

(४)

समाधि में जगन्माता के साथ वार्तालाप

एक दूसरे दिन श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में अपने कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे की सीढ़ी पर बैठे हैं। साथ में राखाल, मास्टर तथा हाजरा हैं। श्रीरामकृष्ण हँसी हँसी में बचपन की अनेक बातें कह रहे हैं।

सायंकाल हुआ। श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हैं। अपने कमरे में छोटे तख्त पर बैठे जगन्माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ, तू इतना झमेला क्यों करती है? माँ, क्या मैं वहाँ पर जाऊँ? यदि तू ले जाएगी तो जाऊँगा।”

श्रीरामकृष्ण का किसी भक्त के घर पर जाना तय हुआ था। क्या वे इसीलिए जगन्माता की आज्ञा के लिए इस प्रकार कह रहे हैं?

जगन्माता के साथ श्रीरामकृष्ण फिर वार्तालाप कर रहे हैं। सम्भव है अब किसी अन्तरंग भक्त के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ, उसे शुद्ध बना दो। अच्छा माँ, उसे एक कला क्यों दी?”

श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप हैं। फिर कह रहे हैं, “ओफ! समझा। इसी से तेरा काम होगा।” सोलह कलाओ में से एक कला शक्ति द्वारा तेरा काम अर्थात् लोकशिक्षा होगी - क्या श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं?

अब भावविभोर स्थिति में मास्टर आदि से आद्याशक्ति तथा अवतार-तत्त्व के सम्बन्ध में कह रहे हैं -

“जो ब्रह्म है, वही शक्ति है। मैं उन्हीं को माँ कहकर पुकारता हूँ। जब वे निष्क्रिय रहते हैं तब उन्हें ब्रह्म कहते हैं, और जब वे सृष्टि, स्थिति, संहार कार्य करते हैं, तब उन्हें शक्ति कहते हैं। जिस प्रकार स्थिर जल और हिलता-डुलता जल। शक्ति की लीला से ही अवतार होते हैं। अवतार प्रेम-भक्ति सिखाने आते हैं। अवतार मानो गाय का स्तन है। दूध स्तन से ही मिलता है। मनुष्य रूप में वे अवतीर्ण होते हैं।”

कोई कोई भक्त सोच रहे हैं, क्या श्रीरामकृष्ण अवतारी पुरुष हैं, जैसे श्रीकृष्ण, चैतन्यदेव, ईसा?


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