भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 307

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

२८४श्रीरामकृष्णवचनामृत१९ अगस्त, १८८३

“एक ही सच्चिदानन्द का शक्ति के भेद से उपाधिभेद होता है। इसलिए उनके विविध रूप होते हैं। 'तारा, वह तो तुम्हीं हो।' जहाँ कहीं कार्य (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) हैं वहीं शक्ति है। परन्तु जल स्थिर रहने पर भी जल है और हिलोरें, बुलबुले आदि उठने पर भी जल ही है। सच्चिदानन्द ही आद्याशक्ति हैं – जो सृष्टि, स्थिति, प्रलय करती हैं। जैसे कप्तान जब कोई काम नहीं करते तब भी वही हैं, जब पूजा करते हैं तब भी वही हैं, और जब वे लाटसाहब के पास जाते हैं तब भी वही हैं, केवल उपाधि का भेद है।”

कप्तान – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – मैंने यही बात केशव सेन से कही थी।

कप्तान – केशव सेन भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचार हैं; वे बाबू हैं, साधु नहीं।

श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – कप्तान मुझे केशव सेन के यहाँ जाने को मना करता है।

कप्तान – महाराज, आप तो जाएँगे ही, भला उस पर मैं क्या करूँ?

श्रीरामकृष्ण (नाराज होकर) – तुम लाटसाहब के पास रुपये के लिए जा सकते हो, और मैं केशव सेन के पास नहीं जा सकता? वह तो ईश्वरचिन्तन करता है, हरि का नाम लेता है। इधर तुम्हीं तो कहते हो, 'ईश्वर ही अपनी माया से जीव और जगत् हुए हैं।'

(५)

ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय

यह कहकर श्रीरामकृष्ण एकाएक कमरे से उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में चले गये। कप्तान और अन्य भक्त कमरे में ही बैठे उनकी प्रतीक्षा करने लगे। मास्टर भी उनके साथ बरामदे में आये। बरामदे में नरेन्द्र हाजरा से बातें कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण जानते थे कि हाजरा को शुष्क ज्ञानविचार बड़ा प्यारा है; वे कहा करते हैं, 'जगत् स्वप्नवत् है, पूजा और चढ़ावा आदि सब मन का भ्रम है, केवल अपने यथार्थ रूप की चिन्ता करना ही हमारा लक्ष्य है, और मैं ही वह परमात्मा हूँ – सोऽहम्।'

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – तुम लोगों की क्या बातचीत हो रही है?

नरेन्द्र (हँसते हुए) – कितनी लम्बी लम्बी बातें हो रही हैं।

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – किन्तु शुद्ध ज्ञान और शुद्धा भक्ति एक ही है। शुद्ध ज्ञान जहाँ ले जाता है वहीं शुद्धा भक्ति भी ले जाती है। भक्ति का मार्ग बड़ा सरल है।

नरेन्द्र – 'ज्ञानविचार का और प्रयोजन नहीं माँ, अब मुझे पागल बना दो!' (मास्टर से) देखिये, हैमिल्टन की एक किताब में मैंने पढ़ा – ‘A learned ignorance is the end of Philosophy and beginning of Religion.’

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – इसका अर्थ क्या है?

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar