श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ६१
दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ
(१)
अध्यात्मरामायण
आज अगहन की पूर्णिमा और संक्रान्ति हैं। दिन शुक्रवार १४ दिसम्बर १८८३। दिन के नौ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे के दरवाजे के पास दक्षिण-पूर्व के बरामदे में खड़े हैं। पास ही रामलाल खड़े हैं। राखाल और लाटू भी कहीं इधर-उधर पास ही थे। मणि ने आकर भूमिष्ठ हो प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण ने कहा “आ गए, अच्छा हुआ। आज दिन भी अच्छा है।” मणि कुछ दिन श्रीरामकृष्ण के पास रहेंगे। साधना करेंगे। श्रीरामकृष्ण ने कहा है, “थोड़ी साधना करते ही कोई आकर तुम्हें बता देगा, ऐसा ऐसा करो।”
श्रीरामकृष्ण ने इनसे कहा है, “यहाँ अतिथिशाला का अन्न तुम्हारे लिए रोज खाना उचित नहीं। यह साधुओं और कंगालों के लिए है। तुम अपना भोजन पकाने के लिए एक आदमी ले आना।” इसीलिए उनके साथ एक आदमी भी आया है।
उनका भोजन कहाँ पकाया जाएगा, इसकी व्यवस्था कर दी गयी। वे दूध पीएँगे, इसके लिए श्रीरामकृष्ण ने रामलाल को अहीर से कह देने को कहा।
रामलाल ‘अध्यात्मरामायण’ पढ़ रहे हैं और श्रीरामकृष्ण सुन रहे हैं। मणि भी बैठे हुए सुन रहे हैं -
‘श्रीरामचन्द्रजी सीताजी से विवाह करके अयोध्या लौट रहे हैं। रास्ते में परशुराम से भेंट हुई। श्रीरामचन्द्र ने शिव का धनुष्य तोड़ डाला है, यह सुनकर परशुराम रास्ते में बड़ा गुलगपाड़ा मचाने लगे। मारे भय के दशरथ के होश ही उड़ गए। परशुराम ने एक दूसरा धनुष राम को देकर उस पर उन्हें गुण चढ़ा देने के लिए कहा। राम ने कुछ मुसकराकर बायें हाथ से धनुष्य लेकर गुण चढ़ाकर उसमें टंकार किया। शरासन में शरयोजना करके परशुराम से उन्होंने कहा, अब यह बाण कहाँ छोड़ूँ - कहो। परशुराम का दर्प चूर्ण हो गया। वे श्रीरामचन्द्र को परब्रह्म कहकर उनकी स्तुति करने लगे।”
परशुराम की स्तुति सुनते ही सुनते श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। रह-रहकर,